बुधवार, 22 सितंबर 2010

सिलीगुड़ी में सवा तीन साल------ विजय राजबली माथुर

हांलांकि बाबू जी तो १९६२ से १९६८ तक सिलीगुड़ी में पोस्टेड रहे लेकिन हम लोग ६४ से ६७ तक ही वहां रहे.चक्रवर्ती साःके आश्रमपाड़ा स्थित जिस मकान में हम लोग उतरे थे उसका एक कमरा पक्का व् दूसरा बांस की चटाई की दीवारों का था.छत टीन की थी.बारिश अधिक होने के कारण दोनों और ढलवा टीन की छतें होती थीं.जलवायु के प्रकोप से माँ को एक्जीमा हो गया तो बाबू जी के ऑफिस के एक S D O साः की पत्नी ने हम दोनों भाइयों से कहा की कूएँ से पानी भर के बहन को भी दो सब अपने -अपने कपडे अपने आप धोओ,सब्जी काट के रखो,आटा माड़ लो,जिससे ड्यूटी से आने पर बाबू जी पर अधिक भार न पड़े.इस प्रकार हम लोगों को आत्मनिर्भर रहने की आदत पड़ गयी.वर्षा ऋतू की छुट्टी के बाद जब स्कूल खुला तब दाखिले हुए.दिसंबर में वार्षिक परीक्षा के बाद ६५ में नवीं में आगये.गणित में कमजोर होने के कारण हेड मास्टर कैलाश नाथ ओझा साः ने मुझे साइंस नहीं दी.छुट्टी से लौटने पर साइंस टीचर जुगल किशोर मिश्रा जी ने मुझ से कोमर्स छोड़ कर साइंस लेने को कहा परन्तु मैंने संकाय नहीं बदला.स्कूल के सभी टीचर बहुत अच्छे थे,अच्छा पढ़ाते भी थे.
स्कूल के बारे में- हमारे स्कूल का नाम क्रष्ण माया मेमोरियल हाई स्कोल था.उस में सुबह की पाली में प्राइमरी section चलता था.वस्तुतः वह पहले प्राइमरी स्कूल ही था.हेड मास्टर ओझा साः व वरिष्ठ टीचर पहले सिलीगुड़ी हाई स्कूल में पढ़ाते थे उनका वहां के हेड मास्टर व मेनेजर से विवाद हो गया था.इन लोगों ने हिंदी भाषी छात्रों को लेकर वह स्कूल छोड़ दिया और नेपाली भाषा के इस प्राइमरी स्कूल के सेक्रेट्री डाक्टर इंद्र बहादुर थापा की अनुमति से इसे हाई स्कूल बना दिया.डाक्टर ओझा साः आरा (बिहार) के थे वहां के कुछ छात्रों को यहाँ लाकर अध्यापक बना दिया जो खुद आगे पढ़ते हुए हम लोगों को बढ़िया सरल तरीके से पढ़ाते थे.इनमे से एक मिश्रा जी Pol .sc .के तथा नेपाली मूल के भीम सेन जी अंग्रेजी के प्रो.हो कर गोहाटी यूनिवर्सिटी चले गए.सभी छात्रों को दुःख हुआ लेकिन उनका भविष्य उज्जवल हुआ इसकी खुशी भी मनाई.सेकिंड हेड मास्टर वैद्यनाथ शास्त्री जी भी ३ माह भोपाल यूनिवर्सिटी में deputation पर पढ़ा कर लौट आये.स्कूल का मुख्य फंक्शन वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा के रूप में होता था.हम लोगों के सामने ही हेड मास्टर साः को P.hd .करने पर doctrate भी मिल गयी थी उन्हें सम्मानित किया गया.
डाक्टर के.एन.ओझा--हमारे हेड मास्टर साः भी द्वितीय विश्व युद्ध में सेना में रहे थे-वारेंट औफिसर के रूप में.उन्होंने बताया था उनके बैच में २० लोग भर्ती हुए थे १९ मारे गए.वह आगरा में C O D में तैनात रहे इसीलिए बच गए थे.निराला की ''वर दे वीणा वादिनी वर दे'' कड़क आवाज़ में सस्वर पाठ उनके ओज को दर्शाता था.पहले दिन कोई छात्र उनकी कसौटी पर खरा नहीं उतरा.दुसरे दिन मेरे साथ एक अन्य को उन्होंने पास किया.तीसरे दिन 3 को.६० छात्रों के बीच सिर्फ हम ५ छात्र ही निराला की कविता के लिए उपयुक्त पाए गये.डाक्टर ओझा ने कई पुस्तकें भी लिखीं थी;जब हम लोगों के स्कूल में लाइब्रेरी का प्रबंध हो गया तो उन्होंने कुछ पुस्तकें भेंट कर दीं.
भारत पाक संघर्ष--जी हाँ १९६५ की लड़ाई को यही नाम दिया गया था.टैंक के एक गोले की कीमत उस समय ८० हज़ार सुनी थी.पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना साः की बहन फातिमा जिन्ना को जनरल अय्यूब खान ने चुनाव में हेरा फेरी करके हरा भी दिया और उनकी हत्या भी करा दी परन्तु जनता का आक्रोश न झेल पाने पर भारत पर हमला कर के अय्यूब साः हमारे नए प्रधान मंत्री शास्त्री जी को कमजोर आंकते थे.यह पहला मौका था जब शास्त्री जी की हुक्म अदायगी में भारतीय फ़ौज ने पाकिस्तान में घुस कर हमला किया था.हमारी लड़ाई रक्षात्मक नहीं आक्रामक थी.पाकिस्तानी फौजें अस्पतालों और मस्जिदों पर भी गोले बरसा रही थीं जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन था.लाहौर की और भारतीय फौजों के क़दमों को रोकने के लिए पाकिस्तानी विदेशमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सिक्योरिटी काउन्सिल में हल्ला मचाने लगे.हवाई हमलों के सायरन पर कक्षाओं से बाहर निकल कर मैदान में सीना धरती से उठा कर उलटे लेटने की हिदायत थी.एक दिन एक period खाली था,तब तक की जानकारी को लेखनीबद्ध कर के (कक्षा ९ में बैठे बैठे ही) रख लिया था जिसे एक साथी छात्र ने बाद में शिक्षक महोदय को भी दिखाया था.यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:--
''लाल बहादूर शास्त्री'' -
खाने को था नहीं पैसा
केवल धोती,कुरता और कंघा ,सीसा
खदरी पोशाक और दो पैसा की चश्मा ले ली
ग्राम में तार आया,कार्य संभालो चलो देहली
जब खिलवाड़ भारत के साथ,पाकिस्तान ने किया
तो सिंह का बहादुर लाल भी चुप न रह कदम उठाया-
खदेड़ काश्मीर से शत्रु को फीरोजपुर से धकेल दिया
अड्डा हवाई सर्गोदा का तोड़,लाहोर भी ले लिया
अब स्यालकोट क्या?करांची,पिंडी को कदम बढ़ाया-
खिचड - पिचड अय्यूब ने महज़ बहाना दिखाया
''युद्ध बंद करो'' बस जल्दी करो यु-थांद चिल्लाया
चुप न रह भुट्टो भी सिक्योरिटी कौंसिल में गाली बक आया
उस में भी दया का भाव भरा हुआ था
आखिर भारत का ही तो वासी था
पाकिस्तानी के दांत खट्टे कर दिए थे
चीनी अजगर के भी कान खड़े कर दिए थे
ऐसा ही दयाशील भारतीय था जी
नाम भी तो सुनो लाल बहादुर शास्त्री जी
आज जब भी सोचता हूँ तो यह किसी भी प्रकार से कविता नज़र नहीं आती है पर तब युद्ध के माहोल में किसी भी शिक्षक ने इस में कोई गलती नहीं बताई.
जब जनरल चौधरी बाल बाल बचे-बरसात का मौसम तो था ही आसमान में काला,नीला,पीला धुंआ छाया हुआ था.गर्जन-तर्जन हो रहा था.हमारे मकान मालिक संतोष घोष साः (जिनकी हमारे स्कूल के पास चौरंगी स्वीट हाउस नामक दूकान थी)की पत्नी माँ को समझाने लगीं कि शिव खुश हो कर गरज रहे हैं.आश्रम पाड़ा में ही यह दूसरा मकान था.उस वक़्त बाबू जी बाग़डोगरा एअरपोर्ट पर A G E कार्यालय में तैनात थे.उन्होंने काफी रात में लौटने पर सारा वृत्तांत बताया कि कैसे ५ घंटे ग्राउंड में सीना उठाये उलटे लेटे लेटे गुज़ारा और हुआ क्या था?
दोपहर में जब हल्ला मचा था तब मैं और अजय राशन की दूकान पर थे,शोभा बाबू जी के एक S D O साः के घर थी,घर पर माँ अकेली थीं.जब हम लोग राशन ले कर लौटे तब शोभा को बुला कर लाये.पानी बरस नहीं रहा था,आसमान काला था,लगातार धमाके हो रहे थे.बाबू जी एयर फ़ोर्स के अड्डे पर थे इसलिए माँ को दहशत थी,मकान मालकिन उन्हें ढांढस बंधा रही थीं.माँ तक उन लोगों ने पाकिस्तानी हमले की सूचना नहीं पहुँचने दी थी.
बाबू जी ने बताया कि चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल जतिंद्र नाथ चौधरी बौर्डर का मुआयना करने दिल्ली से चले थे जिसकी सूचना जनरल अय्यूब तक लीक हो गयी थी.अय्यूब के निर्देश पर पूर्वी पाकिस्तान से I A F लिखे कई ज़हाज़ उन्हें निशाना बनाने के लिए उड़े.इधर बागडोगरा से बम वर्षक पूर्वी पाकिस्तान जाने के लिए तैयार खड़े थे. जनरल चौधरी के आने के समय यह घटना हुई.उधर जनरल चौधरी को हांसीमारा एअरपोर्ट पहुंचा दिया गया क्योंकि हमारी फौजों को पता चल गया था कि पाक को खबर लीक हो गयी है.बागडोगरा एअरपोर्ट का इंचार्ज I A F लिखे पाकिस्तानी ज़हाज़ों पर फायर का ऑर्डर नहीं कर रहा था और वे हमारे बम लदे ज़हाज़ों पर गोले दाग रहे थे लिहाज़ा सारे बम जो पाकिस्तान पर गिरने थे बागडोगरा एअरपोर्ट पर ही फट गये और आसमान में काला तथा रंग बिरंगा धुआं उन्हीं का था.डिप्टी इंचार्ज एक सरदार जी ने अवहेलना करके I A F लिखे पाक ज़हाज़ों पर फायर एंटी एयरक्राफ्ट गनों से करने का ऑर्डर दिया तब दो पाक ज़हाज़ बमों समेत नष्ट हो गये दो भागने में सफल रहे.जनरल चौधरी को सीधे दिल्ली लौटा दिया गया और उनकी ज़िन्दगी जो तब पूरे देश के लिए बहुत मूल्यवान हो रही थी बचा ली गयी.
मेले और प्रदर्शनी-युद्ध के बाद दुर्गा पूजा के पंडालों में अब्दुल हमीद आदि शहीदों की मूर्तियाँ भी सजाई गयीं टूटे पाकिस्तानी पैटन टैंकों की भी भी झलकियाँ दिखाई गयीं.काली पूजा के समय भी युद्ध की याद ताज़ा की गयी.
अगली किश्त में जारी.....
Typist-Yashwant Mathur
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फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणियाँ :
AAI द्वारा बागडोगरा एयरपोर्ट को पूर्णिया भेजने का निर्णय ---
30 जूलाई 2015 :


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3 टिप्‍पणियां:

  1. .

    आदरणीय विजय माथुर जी,

    आपके संस्मरण पढ़ते समय बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आपके बताये गए प्रसंग बहुत प्रेरक होते हैं। मन उर्जा एवं स्फूर्ति से भर उठता है। शास्त्री जी पर लिखी कविता बहुत उत्कृष्ट है एवं उनके व्यक्तित्व को बखूबी बयान करती है। यदि आपकी तरह और भी लोग इस प्रकार संस्मरण लिखें तो हम लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

    यशवंत जी,
    आपने बहुत मेहनत से टाइप किया है। आपका कार्य एवं निष्ठां बेहद सराहनीय है ।

    आभार।

    .

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद दिव्या जी.

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  3. आसमान में काला,नीला,पीला धुंआ
    आपकी रचना बहुत ही रोचक रहती है !
    पढ़ने में बहुत अच्छा लगता है :)

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