शनिवार, 16 जुलाई 2016

सत्य कहने - मानने का साहस सब में नहीं होता ------ विजय राजबली माथुर



*चौधरी चरण सिंह जी जिस मेरठ कालेज,मेरठ के छात्र रहे उसी कालेज का 1969-71 मैं भी छात्र रहा हूँ। हमारे सोशियोलाजी के एक प्रोफेसर साहब जो चौधरी साहब की जाति से ही संबन्धित थे और चौधरी साहब के नाम से मशहूर थे तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह जी के कई कार्यों की सामाजिक समीक्षा किया करते थे , हालांकि यह कोर्स से हट कर होती थी। उनके अनुसार छपरौली में चौधरी चरण सिंह के कार्यकर्ता दलित बस्तियों को घेर कर उन लोगों को निकलने नहीं देते थे और उनके वोट चौधरी साहब को डाल लिए जाते थे। अखबारों की सुर्खियों में रहता था चौधरी साहब को दलितों का भरपूर समर्थन।
*इस वक्त भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल उस वक्त के SYS (समाजवादी युवजन सभा ) नेता और मेरठ कालेज छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष रहे सतपाल मलिक साहब जिनकी दौराला की शुगर फेक्टरियों से चौधरी चरण सिंह जी को भरपूर चन्दा मिलता था उनके छात्रसंघ 'एच्छिक' किए जाने के निर्णय से क्षुभ्ध होकर उनको चप्पलों की माला पहनाने की घोषणा कालेज कैंपस में कर गए थे।
*मुख्यमंत्री रहते ही चरण सिंह जी एक बार मेरठ के तत्कालीन जज जगमोहन लाल सिन्हा साहब के पास घर पर किसी केस के सिलसिले में पहुंचे थे। सिन्हा साहब ने अर्दली से पुछवाया था कि, पूछो चौधरी चरण सिंह मिलना चाहते हैं या मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह। चौधरी साहब ने जवाब भिजवाया था कि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह जज साहब से मिलना चाहते हैं।  सिन्हा साहब ने बगैर मिले ही उनको लौटा दिया था यह कह कर कि, उनको मुख्यमंत्री से नहीं मिलना है। केस का निर्णय चौधरी साहब के चहेते के विरुद्ध आया था । सिन्हा साहब को एहसास था कि उसी की सिफ़ारिश मुख्यमंत्री करना चाहते थे जिस कारण वह उनसे नहीं मिले थे। 1975 में इन सिन्हा साहब ने ही इलाहाबाद हाई कोर्ट में इन्दिरा गांधी के निर्वाचन के विरुद्ध निर्णय दिया था।
*संविद सरकार ने चौधरी चरण सिंह के स्थान पर  राज्यसभा सदस्य त्रिभुवन नारायण सिंह जी (लाल बहादुर शास्त्री जी के मित्र और वैसे ही ईमानदार ) को मुख्यमंत्री बना लिया था। उनको छह माह के भीतर विधायक बनना था गोरखपुर के मनीराम क्षेत्र से उनको उप चुनाव लड़ना था। कांग्रेस ने अमर उजाला केअलीगढ़ स्थित पत्रकार  राम कृष्ण दिवेदी को खड़ा किया था चौधरी चरण सिंह जी ने गुपचुप उनको समर्थन दिला दिया और अपने मोर्चे के उम्मीदवार टी एन सिंह को हरवा दिया वह त्याग-पत्र देकर वापस राज्यसभा चले गए।
*1971 के लोकसभा के मध्यवधी चुनाव में चौधरी चरण सिंह शामली संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी थे उनके विरुद्ध भाकपा के ठाकुर विजय पाल सिंह खड़े थे। चौगटा मोर्चे का भी प्रत्याशी मैदान में था लेकिन उसके वोट कम्युनिस्ट विजयपाल सिंह जी को डलवाए गए और चौधरी चरण सिंह जी को हरवा दिया गया। तब जनसंघ के ए बी बाजपेयी साहब ने खुल्लमखुल्ला कहा था कि, हमने मनीराम की हार का बदला ले लिया।
*1977  में जब  बाबू जगजीवन राम को पी एम बनाने का सवाल आया था चौधरी चरण सिंह जी अड़ गए थे कि वह दलित प्रधानमंत्री नहीं कुबूल करेंगे जिस कारण फिर मोरारजी देसाई  पी एम बने थे और जब 1979 में उनके बाद फिर से बाबू जगजीवन राम जी का नाम आया तब चंद्रशेखर जी उनको न बनाने के लिए अड़ गए थे जिससे चौधरी चरण सिंह जी इन्दिरा जी के समर्थन से पी एम बन सके थे।



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54 वर्ष पूर्व 1962 में छोटी दिवाली के रोज़ हमारे 'रूक्स हायर सेकेन्डरी स्कूल,' बरेली कैंट जो अब 'रवीन्द्रनाथ टैगोर इंटर कालेज ' के नाम से जाना जाता है में हमारी कक्षा V I की छात्राओं से कक्षाध्यापक दीनानाथ जी द्वारा 'धर्मयुग' में प्रकाशित एक नाटक का मंचन करवाया  गया था जिसकी प्रारम्भिक पंक्तियाँ थीं ---" अमर सिंह तो मर गया, लक्ष्मी होकर करें मजूरी "।

भले ही यह एक व्यंग्य संगीत नाटिका हो किन्तु इसके द्वारा इस कटु  'सत्य ' को उजागर किया गया था कि, इस संसार में लोगों के नाम से भ्रम हो सकता है उसके अनुरूप वे होते नहीं हैं। प्रस्तुत फोटो द्वारा आरोप लगाने वाले प्रिंसपल साहब इसका ज्वलंत उदाहरण हैं जिनकी सत्य से मित्रता तो दूर-दूर तक नहीं ही है।जब कोई विख्यात हो जाता है तो समझने लगता है कि, वह जो भी झूठ परोस देगा उसे लोग उसकी ख्याति व उम्र के चलते सत्य ही मान लेंगे। इसी कारण आईने में अपना ही चेहरा देख कर दूसरे पर निराधार आरोप मढ़ दिया और जब इरादतन ऐसा किया गया हो तब खेद या पश्चाताप का प्रश्न ही कहाँ उठता है?

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फेसबुक पर अक्सर कुछ लोग अपनी पोस्ट को लाईक करने व शेयर करने का अनुरोध करते दिखते हैं जबकि ऐसे लोग खुद दूसरों की पोस्ट शायद न ही शेयर करते हैं और न ही लाईक। लेकिन इसके विपरीत जब किसी विद्वान की अच्छी पोस्ट पर कुछ कमेन्ट करते हैं तब पोस्ट लेखक तो उसे लाईक करते हैं जबकि,मिश्रा,तिवारी,त्रिपाठी,पाण्डेय उपजाति के ब्राह्मण बेवजह कूद कर अनर्गल टिप्पणियाँ कर देते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि, एक अच्छे पोस्ट पर भी कोई कमेन्ट अहंकारी लोगों की अनर्गल टिप्पणियों से बचने हेतु न किया जाये। 
यदि किसी अच्छी पोस्ट को ब्लाग में स्थान दिया है तो अधिकांश प्रख्यात विद्वानों ने उसे पसंद किया है। किन्तु यदि किसी को महत्व दे दिया जाये और वह पूर्व ख्याति प्राप्त नहीं है न ही वह दूरदृष्टा निकले तो उसके दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाते हैं। तब ऐसी पोस्ट को हटाना ही श्रेयस्कर रहता है।
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

डाक्टर्स डे पर कुछ चिकित्सकों का ज़िक्र ------ विजय राजबली माथुर



यों तो समय समय पर अनेक चिकित्सक संपर्क में आते ही रहते हैं किन्तु जिनसे कुछ व्यक्तिगत आधार पर निजत्व रहा उनमें से ही जिनकी कुछ खास बातें याद हैं उनका ही उल्लेख हो सकेगा।
डॉ रामनाथ :
सबसे पहले डॉ रामनाथ का ज़िक्र करना चाहूँगा जो होटल मुगल,आगरा में हमारे  एक साथी के सहपाठी थे। उनसे मित्रवत ही मुलाक़ात हुई थी। माता जी के इलाज के लिए उनसे सलाह व दवा भी लेने लगे थे।  :उनके परामर्श  और सहयोग पर ही मैंने आयुर्वेद रत्न किया तथा वैद्य के रूप में RMP रेजिस्ट्रेशन भी करवाया। हालांकि वह तो इसी रेजिस्ट्रेशन पर एलोपैथी की ही ज़्यादा प्रेक्टिस करते थे। एलोपैथी व आयुर्वेदिक औषद्धियों दोनों का ही अध्यन कोर्स में किया भी था। किन्तु मेरी दिलचस्पी व जानकारी  होम्योपैथी औषद्धियों की अधिक थी/है। अतः मैंने प्रेक्टिस तो नहीं की किन्तु आयुर्वेदिक व होम्योपैथी उपचार परिचितों को बताता रहा।
सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज,आगरा के एक पूर्व चिकित्सक जिनका नर्सिंग होम हमारी कालोनी में ही था चाहते थे कि, मैं घर पर क्लीनिक खोल लूँ और क्रटिकल केस उनको रेफर करता रहूँ औरों की भांति मुझे कमीशन मिलता रहेगा। परंतु इस प्रकार धनार्जन मैं कर ही नहीं सकता था अतः उनके प्रस्ताव पर अमल नहीं किया।
इन्ही रामनाथ जी के पिताजी (कालीचरण वैद्य जी ) से एक बार माँ की दवा लेकर उनको पैसे दे आया था। अगले दिन फिर जाने पर पहले तो उन्होने वे पैसे लौटाए और फिर कहा कि तुम मेरे बेटे के मित्र हो तुमने हिम्मत कैसे की पैसे देने की और हिदायत दी कि आगे से दवा ले जाओ पैसे न दो। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है सिर्फ 36 वर्ष पूर्व 1980 की बात है यह। लेकिन अब तो अपनी तीन-तीन जन्म पत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त करने वाले डॉ ज़रूरत पर सलाह मांगने पर चुप्पी साध लेते है। 36 वर्षों में चरित्र इतने बदल गए हैं।

डॉ डी मिश्रा :
इन डॉ रामनाथ जी के क्लीनिक के सामने ही डॉ डी मिश्रा साहब ने अपना होम्योपैथी का क्लीनिक खोला था और उनसे परिचय रामनाथ जी की मार्फत ही हुआ था। डॉ मिश्रा सिर्फ डॉ रामनाथ का मित्र होने के नाते मुझे जानते थे उनको मेरी होम्योपैथी में दिलचस्पी और आयुर्वेद रत्न होने की जानकारी नहीं थी। एक बार उनके कंपाउंडर जो डॉ रामनाथ के ही सहपाठी भी थे अपने पिता जी के निधन के कारण बंगलौर गए तब उनके स्थान पर  उनके आने तक डॉ मिश्रा ने मेरा सहयोग लिया था। इस दौरान उनकी कलाकारियों से परिचित होने के कई अवसर प्राप्त हुये। वैसे डॉ मिश्रा पाईलट आफ़ीसर थे और होटल क्लार्क शीराज, आगरा के पूर्व जेनरल मेनेजर के पुत्र थे। लंदन की उड़ानों के दौरान वहाँ की किसी होम्योपैथिक संस्था से रेजिस्ट्रेशन करवाकर वह होम्योपैथ चिकित्सक बन गए थे। अपने पिताजी के लकवाग्रस्त होने पर इंडियन एयर लाईन्स की सेवा जल्दी ही छोड़ दी थी । प्रारम्भ में वह सुबह हाथरस में और शाम को आगरा में प्रेक्टिस करते थे। फिर हाथरस जाना बंद कर दिया था। 
एक दिन किसी बच्चे के पेट में तीव्र दर्द होने के कारण उन्होने रेक्टीफ़ाईड स्प्रिट में मिला कर एलोपैथी की पिप्टाल के ड्राप्स देकर शीघ्र राहत प्रदान की थी। बाद में मेरे पूछने पर बोले बिजनेस में थोड़ा-बहुत इम मोरेल होना पड़ता है। अर्थात चिकित्सक का पेशा वह बतौर बिजनेस कर रहे थे। 
एक दिन मेहरा आफ़सेट प्रेस के श्याम मेहरा साहब जो उनके क्लब के साथी थे अपनी श्रीमती जी  के साथ उन की दवा लेने आए हुये थे अपनी कुछ समस्या भी बताने लगे। डॉ मिश्रा ने मुझसे कहा माथुर साहब श्याम बाबू को BG की एक डोज़ दे दो। मैंने सादी  गोलियों की पुड़िया दे दी। थोड़ी देर में उन्होने श्याम बाबू से पूछा कुछ राहत है? वह बोले हाँ थोड़ा ठीक है, डॉ मिश्रा ने उनको थोड़ी देर और रुकने को कहा उसके बाद ही कार ड्राइव करना ठीक रहेगा। जब वह चले गए तब मैंने डॉ मिश्रा से पूछा कि, BG(ब्लैंक  ग्लोबल्स ) अर्थात सादी  गोलियों से मेहरा साहब को फायदा कैसे हो गया? तब डॉ मिश्रा का जवाब था कि, उनको हुआ ही क्या था? वह तो अपनी मिसेज को यह जतलाना चाहते थे कि, वह भी बीमार हैं जिससे वह अपनी बीमारी का गम भूल जाएँ। तो यह था डॉ मिश्रा का साइक्लोजिकल ट्रीटमेंट। 
डॉ खेमचंद खत्री :
डॉ के सी खत्री, होम्योपैथ से व्यक्तिगत परिचय उन साथी की मार्फत ही हुआ था जिनके मार्फत डॉ रामनाथ से परिचय हुआ था। वैसे डॉ खत्री को मैं इसलिए जानता था कि, वह पहले डॉ पारीक के स्टोर्स में कार्यरत थे और मैं वहाँ से होम्योपैथी दवाएं खरीदता था। फिर डॉ खत्री के स्टोर्स से लेने लगा। हालांकि डॉ खत्री खुद दयालबाग के राधास्वामी सत्संग के सेक्रेटरी थे और उनको मेरे कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध होने की जानकारी थी किन्तु व्यक्तिगत स्तर पर मधुर संबंध रहे। जब उनके दामाद साहब का स्टोर दयालबाग में खुल गया तब नजदीक होने के कारण उनसे दवाएं खरीदने लगे। वहाँ डॉ खत्री आते रहते थे और उनसे मुलाक़ात होती रहती थी। उनके दामाद डॉ डी डी पाराशर तो मुझे गुरु जी कहते थे और काफी सम्मान देते थे। आगरा छोडने तक इन दोनों से संपर्क बना रहा था।   

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शनिवार, 25 जून 2016

बउआ को 22 वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजली -------- विजय राजबली माथुर

(स्व.कृष्णा माथुर : जन्म- 20 अप्रैल 1924 मृत्यु - 25 जून 1995 )

जिस समय रात्रि पौने आठ बजे बउआ (माँ ) ने अंतिम सांस ली मैं और यशवंत ही पारिवारिक सदस्य वहाँ थे। इत्तिफ़ाक से कंपाउंडर महोदय ग्लूकोज चढ़ाने आए हुये थे। 16 जून 1994 को शालिनी व 13 जून 1995 को बाबूजी के निधन के बाद आगरा में मैं और यशवंत ही थे। अजय अपने परिवार के साथ फरीदाबाद में कार्यरत होने के कारण थे। दो दिन पूर्व 23 जून को ही आगरा से गए थे ड्यूटी ज्वाइन करने। शालिनी के निधन के बाद शोभा (बहन ) ने यशवंत को माँ से अपने साथ ले जाने को मांगा था, किन्तु अजय की श्रीमती जी ने ऐसा न करने की उनको सलाह दी थी। यदि माँ ने मेरी सलाह  के बगैर अपनी बेटी को अपना  पौत्र सौंप दिया होता तो उस समय मैं ही अकेला वहाँ होता। 

यशवंत की निष्क्रिय फेसबुक आई डी पर यह सूचना थी जिसे उसने 18 जून 2016 को अचानक देखा ---
एकदम से धक्का लगा छोटे बहनोई साहब के अचानक निधन समाचार से। जब इस बाबत बहन से ज़िक्र किया तो यह उत्तर मिला जिससे और भी धक्का लगा ---

भले ही हमें साढ़े तीन माह बाद ही पता चला लेकिन जब चल गया तो छोटी बहन को इस समय कोई भी उत्तर देना नैतिकता के विरुद्ध होगा और फिर वह महिला होने के नाते भी तमाम सहानुभूतियाँ बटोर ही लेंगी।दिल तो कोई भी चीर कर नहीं दिखा सकता लेकिन दिल पर हाथ रख कर ईमानदारी से सोचने पर सच का एहसास तो हो ही जाता है।  फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि, मेरे घर के पते के विजिटिंग कार्ड शोभा, कमलेश बाबू और उनके बड़े बेटी-दामाद को मैंने खुद अपने हाथ से दिये थे जब वे लोग 2011 में लखनऊ कमलेश बाबू की  भतीजी की शादी में आए थे। वहाँ जाकर खुद मैंने कमलेश बाबू व उनके बड़े दामाद को घर पर आने का आग्रह किया था । शोभा - कमलेश बाबू तो दो दिन हमारे घर पर रुके भी थे जबकि उनके बेटी - दामाद व धेवती मिल कर चले गए थे ।कमलेश बाबू के भाई दिनेश हमारे घर दो बार आ चुके थे और फोन पर उनकी पत्नी ने  बताया था कि  शादी का कार्ड डाक से भेज चुके हैं। पता उनके पास भी था । उनके जरिये भी सूचित किया जा सकता था। यहाँ के प्रवास और फिर लौटने के बाद उन लोगों के किस कदम के कारण तब से टेलीफोनिक संपर्क टूटा यह तो अपने दिल पर हाथ रख कर सोचने की बात थी। ई -मेल एड्रेस भी कमलेश बाबू तथा उनके दोनों दामादों व छोटी बेटी के पास थे। खैर बड़े होने के नाते इल्जाम तो  हमें ही सहने ही होंगे। 

माँ और कमलेश बाबू दोनों के जन्मदिन एक ही थे 20 अप्रैल। इस बार किसी की पुण्यतिथि पर हवन नहीं कर सका हूँ। मौका मिलते ही कमलेश बाबू की आत्मा की शांति हेतु भी कर लेंगे। 

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शुक्रवार, 10 जून 2016

स्मृति के झरोखों से ------ विजय राजबली माथुर



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जितेंद्र जी ने यह फोटो 20 मई 2016 को गांधी प्रतिमा,जी पी ओ पार्क, लखनऊ में अपने फोन में किसी के माध्यम से लिया था जिस समय किसान जागरण यात्रा की धरना - सभा चल रही थी। उनकी ख़्वाहिश है कि, इस चित्र को आधार बना कर कोई पोस्ट सार्वजनिक रूप से दी जाये। किसानसभा की रैली से संबन्धित पोस्ट्स पहले ही 'कलम और कुदाल ' ब्लाग पर दी जा चुकी हैं। अतः इस निजी चित्र द्वारा निजी स्मृतियों का वर्णन करना अधिक उपयुक्त रहेगा। 

बात कुछ उल्टी लग सकती है किन्तु जितेंद्र जी के चित्र के माध्यम से उनके पिता जी कामरेड हरमिंदर पांडे जी का ज़िक्र पहले करना उचित प्रतीत होता है जिनसे अभी तक सिर्फ एक ही बार 08 जून 2011 को भेंट हुई है जबकि जितेंद्र जी से यह दूसरी मुलाक़ात थी। 

कामरेड हरमिंदर पांडे जी ने 22, क़ैसर बाग भाकपा के प्रदेश कार्यालय पर अपनी टीचर्स यूनियन की एक बैठक बुलाई थी । डॉ गिरीश जी ने उसमें भाग लेने हेतु मुझे भी sms भेज दिया था, अतः मैं पहुँच गया था। परिचय होने पर जब हरमिंदर पांडे जी को यह पता चला कि, मुझे लेखन का शौक है और आगरा में मेरे लेख साप्ताहिक व त्रैमासिक पत्रों में छप चुके हैं। मीटिंग शुरू होने से पूर्व जो समय था उसमें उन्होने कुछ लेखों की जानकारी प्राप्त की थी। 'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना ' में मैंने जो विश्लेषण किया है उससे वह अत्यधिक प्रभावित हुये थे। उन्होने गिरीश जी से कहा था कि, इनके लेख 'पार्टी जीवन ' में छाप दिया करें जिससे कामरेड्स को असलियत का पता चल सके एवं वे जनता के बीच चर्चा कर सकें तथा सांप्रदायिक शक्तियों की पोल खोली जा सके। उनसे हाँ-हूँ तो कर दी गई लेकिन आज तक उनकी बात पर अमल नहीं किया गया । क्यों? क्योंकि जैसा मैंने अनुभव किया 'कथनी' और 'करनी ' में अन्तर है जबकि शायद पांडे जी ने इसे न समझा हो। मीटिंग समापन के बाद उनके प्रस्थान करने पर उनके विरुद्ध चर्चा भी कानों तक पहुंची जिससे साफ हो गया कि, भला फिर कैसे उनकी सिफ़ारिश मानी जा सकती थी ?

पार्टी जीवन में मेरे लेख  न छ्पें तो भी  मैं अपने ब्लाग्स के माध्यम से बराबर लेखन में सक्रिय हूँ। और ज़्यादा लोगों तक मेरी बात पहुँच रही है और उसी को दबाने हेतु बाजारवादी कामरेड्स ओछे हथकंडे अपनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। पार्टी जीवन के एक संपादक जो प्रदेश पार्टी के सीता राम केसरी भी हैं खुद को 'एथीस्ट ' होने का भी ऐलान करते हैं और पार्टी दफ्तर में ही चमेली के तेल की खुशबू वाली धूप बत्ती जला कर  तांत्रिक प्रक्रियाएं भी करते हैं। 

संभवतः हरमिंदर पांडे जी इन सब गतिविधियों से अनभिज्ञ होंगे तभी उन्होने मेरे लेख छापने की सिफ़ारिश कर दी थी। पार्टी कार्यालय में जब जितेंद्र जी से पहली बार मुलाक़ात हुई थी और उन्होने अपने पिताजी का नाम लेकर परिचय दिया था तो वास्तव में हमें भी उनसे मिल कर बहुत अच्छा लगा था। फेसबुक के माध्यम से उनसे निरंतर संपर्क है फिर भी किसानसभा की रैली में मिलने पर उन्होने उत्साहित होकर यह चित्र खिंचवा कर स्मृति पटल पर इस मुलाक़ात को चिरस्थाई कर दिया है। किसानसभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड अतुल अंजान साहब से मेरा परिचय कराते हुये (वैसे मैं अंजान साहब से आगरा से ही परिचित था )  जितेंद्र जी ने मेरे ब्लाग- लेखन का ज़िक्र बतौर तारीफ किया था। 

कामरेड जितेंद्र पांडे और उनके पिताजी कामरेड हरमिंदर पांडे साहब सैद्धान्तिक रूप से साम्यवाद के प्रति समर्पित हैं तभी ढोंग-पाखंड-आडंबर विरोधी मेरे विचारों का समर्थन कर देते हैं। वरना तो बाजारवादी/कार्पोरेटी/मोदीईस्ट कामरेड्स तो मुझे हर तरह तबाह करने की किसी भी तिकड़म से नहीं चूकते हैं। मुझे उम्मीद है कि, इन दोनों से मुझे आगे भी समर्थन मिलता रहेगा। 
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फेसबुक कमेंट्स : 
10 जून 2016 

10 जून 2016 

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मंगलवार, 24 मई 2016

देश की जनता भूखी है या कारपोरेट ने जनता लूटी है ? ------ विजय राजबली माथुर

हमारी पार्टी के एक साथी की तबीयत खराब होने की सूचना आज फोन पर प्राप्त  हुई तो शाम को चार बजे उनको देखने उनके घर गया । उनके स्वास्थ्य की कुशल क्षेम हमने पूछी तो उन्होने हम से यह सवाल किया कि, आप आज आए कैसे ? आज तो आपको रास्ते में काफी दिक्कत हुई होगी क्योंकि आज 'बड़ा मंगल ' है। अब से 59 वर्ष पूर्व जब हम लोग लखनऊ में ही थे तब तो जेठ महीने का दूसरा मंगल ही बड़ा मंगल होता था। 1961 में बाबूजी के स्थानांतरण के बाद हम लोग लखनऊ से बाहर रहे फिर जब 48 वर्ष बाद पुनः यहीं आए तब यहाँ जेठ माह के चारों मंगल को बड़ा मंगल की संज्ञा दे कर जगह-जगह पूरी - सब्जी , पकौड़ी - छोले आदि - आदि बांटते  और लपकते लोगों को पाया। यह मुफ्त वितरण सड़कों पर जगह - जगह जाम का कारण बंनता है। अपने घर से एक किलो मीटर दूर ज़रूर ऐसा जाम पाया किन्तु रिंग रोड पर भारी वाहन आज रोके जाने से रास्ता साफ  -  सुथरा मिल गया था क्योंकि हाई  -  वे के किनारे -  काफी दूर ऐसे कैंप लगे थे जिन पर गरीब ही नहीं कार, जीप वाले भी लाईन लगाए खड़े देखे थे। 

पहले जब हम यहाँ थे तब लोग मीठा शर्बत, बूंदी या अंगूरदाना ही बांटते थे । अब नमकीन भोजन बांटा जाने लगा है। सपा से संबन्धित एक अल्पसंख्यक नेता के 
 परिवार में तो एक वक्त का पूरे परिवार का भोजन ही ऐसे कैंप में बंटतेभोजन से जुटालिया जाता है। 

अल्पसंख्यक मजहब से संबन्धित जिन वरिष्ठ साथी को मैं देखने गया था ऐसे नज़ारों पर उनकी टिप्पणी थी कि दरअसल देश की जनता भूखी है इसलिए जहां भी मुफ्त खाना मिलता है भीड़ जुट जाती है। उन्होने एक पुराने किस्से काज़िक्र करते हुये बताया कि एक बहुत गरीब मजदूर जो एक ढाबे पर काम करता था और जिसका कोई संबंधी न था जब नहीं रहा तो उन लोगों ने चंदा जूटा कर उसका अंतिम संस्कार करा दिया था। उस चंदे की रकम में से उस वक्त तीन हज़ार रुपए बच गए थे। उन लोगों ने उन तीन हज़ार बचे रुपयों से पूरी  -  सब्जी बनवा कर फैजाबाद रोड पर बँटवा दी। उस दिन न तो मंगल था न नौरात्र की अष्टमी - नवमी तब भी उसे पाने की होड में कार सवार भी जुट गए थे और किसी ने भी न पूछा कि आज यह भोजन किस लिए बांटा जा रहा है, बस सबको लपकने की होड थी। इसलिए वह तब से यही कहते हैं कि, देश की जनता भूखी है। 
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1087944084600900

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जहां तक ज्योतिष विज्ञान का संबंध है भोजन आदि 'दान ' करना किसी  - किसी के लिए कितना घातक हो सकता है इसे लखनऊ के गोंमती नगर क्षेत्र में रहने वाले UPSIDC के एक एक्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर साहब भुक्त  -  भोगी के रूप में सही से बता सकते हैं। लगभग दस वर्ष पूर्व जब यह इंजीनियर साहब आगरा में पोस्टेड थे वहाँ मेरे संपर्क में आए थे तब मुझे उनको लिखित में 'दान ' का निषेद्ध करना पड़ा था। वह लोगों को खूब खाना दान में खिलाते थे और खूब
लुटते थे क्योंकि उनको 'अन्न दान ' नहीं करना चाहिए था। उन्होने मुझसे दान निषेद्ध की बात इसलिए लिखित में ली थी क्योंकि मुझसे पूर्व वह जिन भी पोंगा - पंडितों के फेर में थे वे उनसे खूब दान करवाते थे जो उनके लिए परेशानी का सबब था। जब मंदिर के पुजारियों को ज्योतिषी मानते हुये उनसे सलाह ली जाती है तब ऐसे ही दुष्परिणाम मिलते हैं जो ज्योतिष को बदनाम भी करते हैं और हतोत्साहित भी। 
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1087956034599705 

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दो सप्ताह पूर्व टाटा डोकोमो ने sms के जरिये सूचित किया कि, वे 15 मई 2016 से CDMA सर्विस बंद कर रहे हैं जब उनसे कहा कि, GSM सर्विस में इसे ट्रांसफर कर दें तो तमाम अड़ंगे खड़े कर दिये। अखबार से पता लगा कि, रिलायंस ने अपने ग्राहकों को GSM की सिम CDMA के बदले खुद ही दे दी थीं। लेकिन फिर भी तमाम लोगों को हैंड सेट तो नए खरीदने ही पड़े। भले ही हमने दूसरे आपरेटर पर mnp करा लिया और अपना पुराना नंबर सुरक्षित बचा लिया लेकिन दस दिन झंझट तो रहा ही बेवजह नया हैंड सेट व सिम खरीदने में अतिरिक्त व्यय हुआ ही। 

इस तरह ये कारपोरेट घराने जब तब जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते रहते हैं। बाजारवाद व्यापार जगत पर ही नहीं राजनीति पर भी हावी है। अब विधानसभाओं व संसद में प्रतिनिधि कारपोरेट घरानों के चहेते ही आसानी से चुन जाते हैं और जन पक्षधरता वाले लोग बड़ी कठिनाई से वहाँ पहुँच पा रहे हैं। फिर भला जनता के हितार्थ काम कैसे हो? श्रम कानूनों  को उदारीकरण के आवरण में कारपोरेट हितैषी एवं श्रमिक विरोधी बनाया जा रहा है। 
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/1087992924596016

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गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

'ज्ञान ' से शत्रुता रख कर जीत - विक्टरी कैसे हासिल होगी ? ------ विजय राजबली माथुर



ब्रह्म समाज के माध्यम से राजा राम मोहन राय ने विलियम बेनटिक से भारत में 'अङ्ग्रेज़ी' शिक्षा लागू करवाईथी। उनका दृष्टिकोण था कि, अङ्ग्रेज़ी साहित्य द्वारा उनके स्वतन्त्रता संघर्षों का इतिहास भी हमारे नौजवान सीखेंगे और फिर भारत की आज़ादी के लिए मांग बुलंद करेंगे और हुआ भी यही। मोहनदास करमचंद गांधी,सुभाष चंद्र बोस,जवाहर लाल नेहरू,भगत सिंह,चंद्रशेखर आज़ाद सभी अङ्ग्रेज़ी साहित्य से भलीभाँति परिचित थे और आज़ादी के बड़े योद्धा बने। 
हालांकि वर्तमान केंद्र सरकार का उद्देश्य 'संस्कृत' को बढ़ाने के पीछे कुछ और है जैसे कि, तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सस्ते भारतीय क्लर्क पाने के उद्देश्य से 'अङ्ग्रेज़ी' को लागू किया था लेकिन वह आज़ादी के आंदोलन का एक बड़ा हथियार भी बनी। उसी प्रकार राजा राम मोहन राय सरीखा व्यापक दृष्टिकोण अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है। जब आप संस्कृत जानेंगे तब आप ब्राह्मण वाद की लूट की चालाकी को भी समझेंगे और उसका प्रतिकारकर सकेंगे। 
उदाहरणार्थ आपको स्तुतियों में एक शब्द मिलेगा- 'सर्वोपद्रव्य नाशनम ' अब ब्राह्मण यजमान से ऐसे ही वाचन करवाता है जिसका आशय हुआ कि, सारा द्रव्य नष्ट कर दो। जब आपकी प्रार्थन्नुसार सब द्रव्य नष्ट होगा तब आप ब्राह्मणों के मकड़ जाल में - दान दक्षिणा देने के फेर में फसेंगे। 
लेकिन अगर आप 'संस्कृत' के ज्ञाता बन जाते हैं तब आप जानेंगे कि, इस शब्द का पहले संधि-विच्छेद करना फिर वाचन करना है। 
अर्थात जानकारी होने पर वह शब्द 'सर्व' + उपद्रव ' + नाशनम पढ़ा जाएगा जिसका अर्थ है सारे उपद्रव अर्थात पीड़ाओं को नष्ट कर दो। अब आप दान-दक्षिणा के फेर में नहीं फंस सकते। 
चतुराई इसी में है कि, अधिकाधिक लोग 'संस्कृत' की जानकारी हासिल करके वेदों के माध्यम से सारे विश्व की मानवता की एकता की बात को बुलंद करें और ब्रहमनवाद की लूट को ध्वस्त करें। 
कुछ ब्राह्मण वादी नहीं चाहते कि संस्कृत पर उनका एकाधिकार समाप्त हो वे उसको सार्वजनिक करने का विरोध कर रहे हैं उनके जाल में नहीं फंसना चाहिए और ज्ञान का विस्तार करना चाहिए जिससे मानव कल्याण संभव हो।

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लेकिन क्या करेंगे जब अति विद्वजन घोंगावादी प्रवृति को त्यागने को ही राज़ी न हों। कभी एथीज़्म/नास्तिकता के नाम पर तो कभी मूल निवासी के नाम पर संस्कृत का विरोध करने वाले वस्तुतः पोंगापंथी ब्राह्मण वाद के उस सिद्धान्त को ही लागू रखने के पक्ष धर हैं जिसके अनुसार 'वेद' पढ़ने का अधिकार शूद्रों को न था और गलती से वेद वचन सुन लेने वाले शूद्र के कान मे सीसा (lead ) डाल कर उसे बहरा बना दिया जाता था। आज के उदारीकरण के युग का सीसा- lead एथीज़्म और मूल   निवासी में रूपांतरित हो गया है। यह वर्ग संस्कृत पर ब्राह्मणों के एकाधिकार वादी वर्चस्व को टूटने न देने के लिए और बहुसंख्यक जनता को मूर्ख बनाए रख कर उल्टे उस्तरे से मूढ़ने हेतु संस्कृत के विरोध में डट कर आवाज़ बुलंद कर रहा है। 
जिसका एक और उदाहरण 'दुर्गा -सप्त शती' से प्रस्तुत है जिसमें एक स्तुति के बीच शब्द ' चाभयदा ' आता है इसका वाचन पोंगा-पंडित ऐसे ही कराते हैं जिसका  अर्थ हुआ कि, आप प्रार्थना कर रहे हैं - और भय दो। जब आप भय मांगेगे तो वही मिलेगा जिसके निराकरण के लिए आप दान-दक्षिणा के फेर में फंस कर अपनी आय व्यर्थ व्यय करेंगे। 
अब यदि आपको संस्कृत का ज्ञान होगा तब आप इसको संधि- विच्छेद करके यों पढ़ेंगे : च + अभय + दा अर्थात 'और अभय दो' जब आप अभय ( भय = डर नहीं ) मंगेगे तो निडर बनेंगे और ब्राह्मण वाद से गुमराह नहीं होंगे। हमने एक ब्लाग के माध्यम से जन - हित में स्तुतियाँ देना प्रारम्भ किया था किन्तु ज़्यादातर लोगों के हज़ारे के  कारपोरेट भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन का समर्थन करने के कारण उस ब्लाग को हटा लिया था । लोग जब जाग्रत ही नहीं होना चाहते तब किया भी क्या जा सकता है। वेदना होती है विद्वानों से मूर्खता की बातें जान कर  । 
 जिन वेदों में विशेषकर 'अथर्व वेद' जो 'आयु का विज्ञान' है में समझाया गया है कि नव रात्र अर्थात नौ जड़ी-बूटियों का सेवन करके 'नीरोग' कैसे रहा जाये उसे पौराणिक ब्राह्मण वादियों ने झगड़े की जड़ बना कर समाज में विग्रह उत्पन्न कर दिया है और मूल निवासी तथा एथीज़्म वादी उस चक्रव्यूह में उलझे हुये हैं। जे एन यू विवाद के मूल में भी यही अज्ञानता है। 'ज्ञान' से शत्रुता रख कर जीत - विक्टरी कैसे हासिल होगी ?
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रविवार, 10 अप्रैल 2016

उदारीकरण का जनता पर प्रभाव : 'सच्चे साधक धक्का खाते और चमचे मज़े उड़ाते हैं' ------ विजय राजबली माथुर

1991 में अल्पमत सरकार के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहा राव साहब ने वर्ल्ड बैंक के पूर्व अधिकारी मनमोहन सिंह जी को वित्तमंत्री बनाया था जिनके द्वारा शुरू किए गए 'उदारीकरण ' को न्यूयार्क में जाकर आडवाणी साहब द्वारा उनकी नीतियाँ चुराया जाना बताया गया  था। उस उदारीकरण की रजत जयंती वर्ष में तमाम विद्वान उसकी प्रशंसा में कसीदे गढ़ रहे हैं जो विभिन्न समाचार पत्रों में सुर्खियों के साथ छ्प रहे हैं।
उदारीकरण से 19 वर्ष पूर्व 20 वर्ष की अवस्था में रु 172और 67 पैसे  मासिक वेतन से मैंने रोजगार शुरू किया था। छह माह में खर्च के बाद इतने पैसे बच गए थे कि, रु 150/-का टेलीराड ट्रांज़िस्टर,रु 110 /-की एक कलाई घड़ी व भाई-बहन समेत अपने लिए कुछ कपड़े बनवा सके थे। अगले छह माह में बचत से रु 300/- का एक टेबुल फैन व माता जी पिताजी के लिए कुछ वस्त्र ले सके थे। तब बैंक में S B a/c मात्र रु 5/- से खुला था और चेक-बुक या किसी चीज़ का कोई शुल्क नहीं लगता था।
उदारीकरण के 25 वर्ष बाद आज कोई बचत नहीं हो पाती है। निखद कही जाने वाली अरहर की दाल खरीदना भी संभव नहीं है। बैंकों में चेकबुक लेने का भी शुल्क देना पड़ता है, बैंक बेवजह के sms भेजते हैं और उनका भी शुल्क काट लेते हैं। दूसरी ब्रांच के लिए नगद जमा करने पर भी 1 प्रतिशत शुल्क काट लेते हैं। बचत न होने से जमा नहीं होता अतः निकासी भी मुमकिन नहीं तब a/c बंद कर दिया जाता है। पहले स्टाफ का व्यवहार सौम्य होता था अब रूखा रहता है।
उदारीकरण से अमीर ही और अमीर हुये हैं गरीब की तो कमर ही टूट गई है और अब तो ज़बान भी बंद की जा रही है।
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इस 19 मार्च को उत्तर प्रदेश सरकार के एक अंडरटेकिंग में  कार्यरत  एक एक्जिक्यूटिव इंजीनियर साहब जो आगरा में भी हमसे ज्योतिषीय परामर्श लेते रहे थे तीन वर्षों के अंतराल के बाद पधारे थे। वह मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश यादव के कार्य से संतुष्ट दीख रहे थे किन्तु उनको कानून-व्यवस्था की एकमात्र शिकायत थी। केंद्र की सरकार के निर्णयों से वह अधिक असंतुष्ट थे। FDI की सर्वाधिक आलोचना उन्होने की। उनका मत था कि, यदि FDI से देश का विकास होता अर्थात लोगों को बेहतर शिक्षा,स्वस्थ्य व जीवन स्तर प्राप्त होता तब यह ठीक हो सकती थी। किन्तु सरकार जिसको विकास कहती है वह विकास नहीं है। उनके अनुसार बढ़िया कपड़ा और कारें विकास का प्रतीक नहीं हैं क्योंकि ये सबको सुलभ ही नहीं हैं। वह कह रहे थे विकास वह होता यदि उनको सार्वजनिक परिवहन से मेरे पास 15 कि मी चल कर आने -जाने की सुविधा मिलती और निजी गाड़ी का प्रयोग न करना पड़ता। FDI से जो नए-नए माल खुल रहे हैं वे देश में असमानता की खाई को ही नहीं चौड़ा कर रहे हैं वरन भ्रष्टाचार के नए आयाम भी गढ़ रहे हैं।

इस बात को उन्होने उदाहरण देते हुये स्पष्ट किया कि जैसे उनके बचपन में उनके पिताजी उन लोगों की ख़्वाहिश पूरी कर देते थे वैसे ही जब वह अपने बच्चों की ख़्वाहिश पूरा करना चाहते हैं तो परेशानी महसूस करते हैं। उनके जमाने में जो बाज़ार में उपलब्ध था उसे पूरा करना उनके पिताजी के लिए मुश्किल न था। आज जब उनके बच्चे माल देखते -सुनते हैं तो चलने को कहते हैं और वहाँ जब रु 500/- में एक चम्मच आइसक्रीम एक -एक बच्चे को दिलाते हैं तो तत्काल डेढ़ हज़ार रुपए निकल जाने पर भी न बच्चों को संतुष्टि मिलती है न ही उनको खुद को तसल्ली मिल पाती है। माल के बाहर क्वालिटी की आइसक्रीम सस्ते में जी भर मिल सकती थी अगर दूसरा विकल्प न होता तो। इस प्रकार माल कल्चर विदेशी कंपनियों को न केवल फायदा पहुंचाने का वरन भारतीय पहचान मिटाने का भी बड़ा संबल बन गया है। वेतन से माल की ख़रीदारी करना संभव नहीं है , माल से माल खरीदने का मतलब है भ्रष्टाचार को अंगीकार करके शान दिखाना।

उनका यह भी साफ-साफ कहना था कि, अगले लोकसभा चुनाव आते-आते जन-असंतोष इतना भड़क जाएगा कि इस सरकार के बूते उसे सम्हालना मुश्किल हो जाएगा, साथ ही सरकार के मंत्री-सांसद जनता का सामना करने की स्थिति में ही नहीं रहेंगे। जिन सरकारी अधिकारी-कर्मचारी के दम पर सरकार चलती है उनका असंतोष भी चरम पर होगा और ये परिस्थितियाँ इस सरकार व इसकी पार्टी को पुनर्मूष्क: भव की स्थिति में ला देंगी। यदि इंजीनियर साहब का आंकलन सही भी निकले तब भी अभी तो तीन वर्ष और दो माह का समय कष्टप्रद है ही।
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इस समाचार से कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि अर्थशास्त्रीय 'ग्रेशम ' के सिद्धान्त के अनुसार " खराब 'मुद्रा' अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है "। उसी प्रकार समाज में खराब लोग हावी रहते हैं और अच्छे लोगों को व्यवहार से दूर कर देते हैं।
*1991ई  में आगरा छावनी से भाकपा प्रत्याशी को किसी तकनीकी कारण से अपना गेंहू की बाल- हंसिया वाला चुनाव चिन्ह न मिल सका था अतः  कामरेड जिलामंत्री के निर्देश पर मैं प्रदेश कार्यालय से उनको मिले चिन्ह 'फावड़ा-बेलचा' के लिए अधिकार-पत्र लेकर वापिस लौट रहा था। लखनऊ जंक्शन से अवध एक्स्प्रेस गाड़ी पकड़ना था। स्टेशन पर बैठ कर इंतज़ार कर रहे थे साथ में एक और सज्जन आकर  बैठ गए थे। अनायास बातों-बातों में हस्तरेखा विज्ञान पर चर्चा छिड़ गई थी। उत्सुकता वश एक गेरुआ वस्त्र धारी अधेड़ पुरुष भी  जगह मांग कर हम लोगों के साथ बैठ गए थे।  वह भी अपना हाथ देखने के लिए ज़ोर देने लगे। जब उनके हाथ देखे तो बाकी बातें कुबूल करते हुये एक बात पर वह कहने लगे इस बात को छोड़ें बहुत पुरानी हो गई है। बात कितनी भी पुरानी हो हाथ में अपनी अमिट रेखा के साथ उपस्थित थी। हालांकि मैं सीधे-सीधे कहने से बच रहा था किन्तु दूसरे यात्री ने साफ-साफ कह दिया कि वह साधू बनने से पूर्व एक अध्यापक थे और किसी की हत्या करने के बाद भेष बदल कर जी रहे थे। उसके बाद वह गेरुआ साधू ट्रेन आने पर हम लोगों से बच कर दूसरे कम्पार्टमेंट से गए।
** 2000 ई में जब दयालबाग, आगरा के सरलाबाग क्षेत्र में मैंने ज्योतिष कार्यालय खोला था तब पास के मंदिर के पुजारी महोदय भी मुझे अपना हाथ दिखाने आए थे । उस वक्त वह 30 वर्ष आयु के थे और 25 वर्ष की आयु में मथुरा में एक हत्या करके फ़रारी पर आगरा में पुजारी बन गए थे जिस बात को बड़ी मुश्किल से उन्होने कुबूला था । उन्होने काफी मिन्नत करके कहा था कि इस बात का किसी से भी ज़िक्र न करूँ कि वह पंडित जी भी मुझे अपना हाथ दिखाने आए थे।
***आगरा में ही सुल्तानगंज की पुलिया स्थित एक मंदिर के पुजारी महोदय का इतिहास यह था कि वह इंदौर स्थित एक मार्बल की दुकान से गबन करके  भागे हुये थे। उनका बेटा आठवीं कक्षा में लगातार तीन वर्ष फेल होने के बाद उनका सहायक पुजारी हो गया था जिसके चरण मथुरा में पोस्टेड एक तहसीलदार अग्रवाल साहब भी छूते थे क्योंकि वह पंडित था।
आज की दुनिया का यही दस्तूर है कि,' सच्चे साधक धक्का खाते और चमचे मज़े उड़ाते हैं'। फिर समाज-देश में क्यों न अफरा-तफरी और बद- अमनी हो।

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 *49 वर्ष पूर्व अर्थशास्त्र विषय का अध्यन करने के दौरान जो नियम ज्ञात हुये उनको समाज में आज हर क्षेत्र में लागू होता देखा जा रहा है। एक है ग्रेशम का सिद्धान्त जिसके अनुसार  " खराब 'मुद्रा' अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है "। उसी प्रकार समाज में खराब लोग हावी रहते हैं और अच्छे लोगों को व्यवहार से दूर कर देते हैं।
 *दूसरा है 'उपयोगिता का सिद्धान्त ' जिसके अनुसार किसी भी वस्तु की उपयोगिता सदा एक सी नहीं बनी रहती है और उस वस्तु का मूल्य उसकी उपयोगिता के अनुसार ही तय होता है।
* तीसरा सिद्धान्त ' मांग और आपूर्ती ' का है जिसके अनुसार वस्तु की मांग अधिक होने व आपूर्ती कम होने पर मूल्य अधिक व मांग कम होने एवं आपूर्ती अधिक होने पर मूल्य कम हो जाता है।

लेकिन सामाजिक/व्यावहारिक जीवन में ' खराब मुद्रा' वाला सिद्धान्त 'उपयोगिता ' तथा 'मांग व आपूर्ती ' वाले सिद्धांतों पर भारी पड़ता है। खराब चलन के लोग कृत्रिम रूप से तिकड़म द्वारा अच्छे चलन वालों को निकृष्ट घोषित करा देते हैं जिससे  उनकी उपयोगिता कम हो जाती है और समाज में उनका मूल्य भी कम आँका जाता है। सामान्य सामाजिक जीवन में इन प्रक्रियाओं पर ध्यान न दिये जाने के कारण राजनीतिक जीवन में भी इनकी पुनरावृति होती है जिसका समाज पर दीर्घकालीन प्रभाव पड़ता है।

अहंकार ग्रस्त राजनीतिज्ञ चापलूसी को अधिक महत्व देते हैं न की योगिता की उपयोगिता को। परिणाम स्वरूप राजनीति व समाज को तो हानि पहुँचती ही है परंतु अंततः उन राजनीतिज्ञों को भी कालांतर में इसके दुष्परिणाम भोगने पड़ जाते हैं। चतुर व बुद्दिमान राजनीतिज्ञ भूल सुधार लेते हैं किन्तु अहंकार ग्रस्त राजनीतिज्ञों को अपनी भूल का एहसास होता ही नहीं है और वे चापलूसों से ही घिरे रह कर व्यर्थ के दोषारोपण सहते रहते हैं बनिस्बत सुधार कर लेने के।

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