शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

क्या आज 'गर्म हवा ' के संदेश की ज़रूरत है ? ------ विजय राजबली माथुर



परिस्थियोंवश 1985 से 2000 तक आगरा के  हींग की मंडी  स्थित शू चैंबर की दुकानों में लेखा कार्य (ACCOUNTING ) द्वारा आजीविका निर्वहन करना पड़ा है। प्रत्यक्ष  रूप से जूता कारीगरों की समस्या को देखा समझा भी है कि, किस प्रकार थोक आढ़तिये  असली निर्माताओं का शोषण करते हैं। इसलिए जबसे गरम हवा का ज़िक्र सुना था इसका अवलोकन करना चाह रहा था ।  प्रस्तुत चित्र में जूता फेकटरी के मालिक सलीम मिर्ज़ा ( बलराज साहनी साहब ) पाकिस्तान से आए सिन्धी कारोबारियों के व्यवसाय और अपने करीबियों के पाकिस्तान चले जाने के बाद की स्थितियों से निबटने के लिए खुद भी कारीगरी करते हुये दिखाई दे रहे हैं। देश विभाजन के बाद भारत से गए मुस्लिम पाकिस्तान में और वहाँ से आए सिन्धी- पंजाबी यहाँ व्यवसाय में समृद्ध हो गए जबकि यहीं देश से लगाव के चलते रह गए मुस्लिम सलीम मिर्ज़ा की ही तरह दाने दाने को मोहताज हो गए। एक बार पलायन का विचार लाकर भी सलीम मिर्ज़ा (बलराज साहनी ) और उनका छोटा पुत्र सिकंदर (फारूख शेख ) कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा रोज़ी रोटी के संघर्ष में शामिल हो गए और देशवासियों की बेहतरी के पुण्य कार्य में लग गए। यही संदेश सथ्यु साहब द्वारा इस फिल्म के माध्यम से दिया गया है। 

जबसे केंद्र में भाजपा के पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है निरंतर रोजगार में गिरावट हुई है और सांप्रदायिक दुर्भावना का तीव्र विस्तार हुआ है। आज़ादी के समय की कम्युनिस्ट पार्टी आज कई कई पार्टियों  में बंट गई है और उनका आंदोलन जनता को आकर्षित करने में विफल है। नोटबंदी अभियान के बाद जनता त्रस्त है और भयभीत भी लेकिन 'एथीस्ट्वाद' : नास्तिकता रूपी दीवार खड़ी करने  के कारण कम्युनिस्ट नेतृत्व ने जनता  को अपनी ओर आने से रोक रखा है। आज जब जरूरत थी कि, पाखंडी सरकार का पर्दाफाश करके उसे जनता के समक्ष अधार्मिक सिद्ध कर दिया जाता और भारतीय वांगमय के आधार पर जनता को कम्यूनिज़्म की ओर ले आया जाता तो केंद्र में भी उसी प्रकार कम्युनिस्ट सरकार लोकतान्त्रिक तरीके से स्थापित हो जाती जिस प्रकार केरल में विश्व की प्रथम निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार बनी थी। काश गरम हवा कम्युनिस्ट नेतृत्व को 'एथीस्ट्वाद' : नास्तिकता रूपी दीवार ढहाने में मदद कर सके और देश की जनता फ़ासिज़्म की जकड़न में फँसने से बच जाये। 

संदर्भ : फिल्म गर्म हवा 





एम एस सथ्यू साहब से संवाद करते प्रदीप घोष साहब 





प्रथम पंक्ति में राकेश जी, विजय राजबली माथुर, के के वत्स 


लखनऊ में दिनांक 04 फरवरी, 2016 को कैफी आज़मी एकेडमी , निशांतगंज के हाल में सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू साहब के साथ 'सिनेमा और सामाजिक सरोकार' विषय पर एक संवाद परिचर्चा का आयोजन कैफी आज़मी एकेडमी और इप्टा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया था ।  
अपनी सुप्रसिद्ध फिल्म 'गर्म हवा' का ज़िक्र करते हुये सथ्यू साहब ने बताया  था कि ,यह इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है किन्तु इसके अंतिम दृश्य में जिसको प्रारम्भ में पर्दे पर दिखाया गया था - राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानी के कुछ अंशों को जोड़ लिया गया था। इस दृश्य में यह दिखाया गया था कि किस प्रकार मिर्ज़ा साहब (बलराज साहनी ) जब पाकिस्तान जाने के ख्याल से तांगे पर बैठ कर परिवार के साथ निकलते हैं तब मार्ग में रोज़ी-रोटी, बेरोजगारी, भुखमरी के प्रश्नों पर एक प्रदर्शन मिलता है जिसमें भाग लेने के लिए उनका बेटा (फारूख शेख जिनकी यह पहली फिल्म थी  ) तांगे से उतर जाता है बाद में अंततः मिर्ज़ा साहब तांगे पर अपनी बेगम को वापिस हवेली भेज देते हैं और खुद भी आंदोलन में शामिल हो जाते हैं। 

एक प्रश्न के उत्तर में सथ्यू साहब ने बताया था कि 1973 में 42 दिनों में 'गर्म हवा' बन कर तैयार हो गई थी। इसमें इप्टा आगरा के राजेन्द्र रघुवंशी और उनके पुत्र जितेंद्र रघुवंशी (जितेंद्र जी के साथ आगरा भाकपा में कार्य करने  व आदरणीय राजेन्द्र रघुवंशी जी को सुनने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त  हुआ है ) आदि तथा दिल्ली इप्टा के कलाकारों ने भाग लिया था। ताजमहल व फ़तहपुर सीकरी पर भी शूटिंग की गई थी। इप्टा कलाकारों का योगदान कला के प्रति समर्पित था। बलराज साहनी साहब का निधन हो जाने के कारण उनको कुछ भी न दिया जा सका बाद में उनकी पत्नी को मात्र रु 5000/- ही दिये तथा फारूख शेख को भी सिर्फ रु 750/- ही दिये जा सके थे। किन्तु कलाकारों ने लगन से कार्य किया था। सथ्यू  साहब ने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बताया कि, 'निशा नगर', 'धरती के लाल' व 'दो बीघा ज़मीन' फिल्में भी इप्टा कलाकारों के सहयोग से बनीं थीं उनका उद्देश्य सामाजिक-राजनीतिक चेतना को जाग्रत करना था। 

कुछ प्रश्नों के उत्तर में सथ्यू साहब ने रहस्योद्घाटन किया कि, यद्यपि 'गर्म हवा' 1973 में ही पूर्ण बन गई थी किन्तु 'सेंसर बोर्ड' ने पास नहीं किया था तब उनको प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से संपर्क करना पड़ा था जिनके पुत्रों राजीव व संजय को वह पूर्व में 'क्राफ्ट' पढ़ा चुके थे। उन्होने बताया कि इंदिराजी अक्सर इन्स्टीच्यूट घूमने आ जाती थीं उनके साथ वी के कृष्णा मेनन भी आ जाते थे। वे लोग वहाँ चाय पीते थे, कभी-कभी वे कनाट प्लेस से खाना खा कर तीन मूर्ती भवन तक पैदल जाते थे तब तक सिक्योरिटी के ताम -झाम नहीं होते थे और राजनेता जन-संपर्क में रहते थे। काफी हाउस में उन्होने भी इंदर गुजराल व इंदिरा गांधी के साथ चर्चा में भाग लिया था। अतः सथ्यू साहब की सूचना पर इंदिराजी ने फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की जिसे तमाम झंझटों के बावजूद उन्होने दिल्ली ले जाकर दिखाया। इंदिराजी के अनुरोध पर सत्ता व विपक्ष के सांसदों को भी दिखाया और इस प्रकार सूचना-प्रसारण मंत्री गुजराल के कहने पर सेंसर सर्टिफिकेट तो मिल गया किन्तु बाल ठाकरे ने अड़ंगा खड़ा कर दिया अतः प्रीमियर स्थल 'रीगल थियेटर' के सामने स्थित 'पृथ्वी थियेटर' में शिव सेना वालों को भी मुफ्त फिल्म शो दिखाया जिससे वे सहमत हो सके। 1974 में यह फ्रांस के 'कान' में दिखाई गई और 'आस्कर' के लिए भी नामित हुई। इसी फिल्म के लिए 1975 में सथ्यू साहब को 'पद्मश्री' से भी सम्मानित किया गया और यह सम्मान स्वीकार करने के लिए गुजराल साहब ने फोन करके विशेष अनुरोध किया था अतः उनको इसे लेना पड़ा। 
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संदर्भ  :
http://krantiswar.blogspot.in/2016/02/blog-post.html
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सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

बाबूजी के स्मरण के बहाने अपनी बात ------ विजय राजबली माथुर


जन्म:24-10-1919,दरियाबाद (बाराबंकी );मृत्यु:13-06-1995;आगरा  

हमारे बाबूजी ताज राजबली माथुर साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' के साथ आभावों में गुज़ार दी लेकिन कभी उफ तक न की न ही कोई उलाहना कभी किसी को दिया। आज जब लोग अपने हक हुकूक के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं हमारे बाबूजी ने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने हक को भी ठुकरा दिया था। मैंने भी पूरी कोशिश करके 'ईमान ' व 'स्वाभिमान ' की भरसक रक्षा की है भले ही अपने ही भाई - बहन की निगाहों में मूर्ख सिद्ध हुआ हूँ। उत्तर प्रदेश के माथुर कायस्थ परिवारों में हमारे  बली  खानदान  से सभी परिचित हैं। 


एक परिचय :

हमारे रिश्ते में एक  भतीजे थे राय राजेश्वर बली जो आज़ादी से पहले यू पी गवर्नर के एजुकेशन सेक्रेटरी भी रहे और रेलवे बोर्ड के सदस्य भी। उन्होने ही 'भातखण्डे यूनिवर्सिटी आफ हिन्दुस्तानी म्यूज़िक' की स्थापना करवाई थी जो अब डीम्ड यूनिवर्सिटी के रूप में सरकार द्वारा संचालित है। उसके पीछे ही उनके ही एक उत्तराधिकारी की यादगार में 'राय उमानाथ बली' प्रेक्षागृह है , वह भी सरकार द्वारा संचालित है।


'बली ' वंश एक ऐतिहासिक महत्व :

जब राय राजेश्वर बली साहब उत्तर-प्रदेश के शिक्षामंत्री थे (आज़ादी से पूर्व सम्बोधन एजुकेशन सेक्रेटरी था ) तब उन्होने महिलाओं की दशा सुधारने के लिए स्त्री-शिक्षा को विशेष महत्व दिया था। संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना करवाना भी इसी दिशा में उठाया गया कदम था। 

ऐसा नहीं है कि ये क्रांतिकारी कदम राजेश्वर बली साहब ने यों ही उठा लिए थे बल्कि इसकी प्रेरणा उनको वंशानुगत रूप से मिली थी। हमारा 'बली ' वंश एक ऐतिहासिक महत्व रखता है । जिस समय बादशाह अकबर की  तूती बोल  रही थी हमारे पूर्वजों ने उनके विरुद्ध मेवाड़ के महाराना प्रताप के पक्ष में बगावत कर दी थी और 'दरियाबाद' में स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी। परंतु उस समय अकबर के विरुद्ध अधिक समय तक आज़ादी टिकाई नहीं जा सकती थी क्योंकि चारों ओर तो अकबर का मजबूत शासन स्थापित था। नतीजा यह हुआ कि शाही सेना ने पूरे के पूरे खानदान को मौत के घाट उतार दिया। परंतु स्थानीय लोग जो हमारे पूर्वजों के प्रति एहसानमंद थे ने किसी प्रकार इस परिवार की एक गर्भिणी महिला को छिपा लिया था। नर-संहार के बाद जब शाही सेना लौट गई तब उनको आगरा उनके भाई के पास भेजने की व्यवस्था की गई जो अकबर के दरबार के ही सदस्य थे। मार्ग में 'नीम' के दरख्त के एक खोटर में उन्होने जिस बालक को जन्म दिया उनका नाम 'नीमा राय ' रखा गया। हम लोग इन्हीं नीमा राय बली  साहब के वंशज हैं।

जब नीमा राय जी 10 -12 वर्ष के हो गए तब इनके मामाजी इनको भी अपने साथ दरबार में ले जाने लगे। यह बहुत ही मेधावी व होनहार थे। कभी-कभी बादशाह अकबर इनसे भी कुछ सवाल उठाते थे और इनके जवाब से बेहद संतुष्ट होते थे। लेकिन पूछने पर भी इनके मामाजी ने इनके पिता का नाम बादशाह को कभी नहीं बताया सिर्फ यही बताया कि उनके भांजा हैं। एक दिन इनके जवाब से अकबर इतना प्रसन्न हुये कि ज़िद्द पकड़ गए कि इस होनहार बालक के पिता का नाम ज़रूर जानेंगे । मजबूर होकर इनके मामाजी को बादशाह से कहना पड़ा कि पहले आप आश्वासन दें कि मेरे इस भांजे की आप जान नहीं लेंगे तब इसके पिता का नाम बताएँगे। अकबर ने ठोस आश्वासन दिया कि इस बालक की जान नहीं ली जाएगी। तब इनके मामाजी ने इनका पूरा परिचय दिया और बताया कि आपके पूरा खानदान नष्ट करने के आदेश के बावजूद मेरी बहन को स्थानीय लोगों ने बचा कर आगरा भिजवा दिया था और रास्ते में इस बालक का जन्म हुआ था। 

अकबर ने नीमाराय साहब के पूर्वजों का छीना हुआ राज-पाट वापिस करने का फरमान जारी कर दिया  और इनको अपनी सेना के संरक्षण में दरियाबाद भिजवाया। बालक नीमाराय  ने वह जगह जहां काफी खून खराबा  हुआ था और उनका खानदान तबाह हुआ था लेने से इंकार कर दिया । तब उसके बदले में दूसरी जगह चुन लेने का विकल्प इनको दिया गया। इनको दौड़ता हुआ एक खरगोश का बच्चा पसंद आया था और इनहोने कह दिया जहां यह खरगोश का बच्चा रुकेगा वही जगह उनको दे दी जाये । दिन भर शाही कारिंदे नीमाराय जी को लेकर खरगोश के बच्चे के पीछे दौड़ते रहे आखिकार शाम को जब थक कर वह खरगोश का बच्चा एक जगह सो गया उसी जगह को उन्होने अपने लिए चुन लिया। उस स्थान पर बादशाह अकबर के आदेश पर एक महल तहखाना समेत इनके लिए बनवाया गया था। पहले यह महल खंडहर रूप में 'दरियाबाद' रेलवे स्टेशन से ट्रेन में बैठे-बैठे भी दीख जाता था। किन्तु अब बीच में निर्माण होने से नहीं दीख पाता है। 

1964 तक जब हम मथुरा नगर, दरियाबाद गए थे इस महल के अवशेष उस समय की याद दिला देते थे। बाहरी बैठक तब तक मिट्टी की मोटी  दीवार से बनी थी और काफी ऊंचाई पर थी उसमें दुनाली बंदूकों को चलाने के स्थान बने हुये थे। लेकिन अब  बड़े ताऊ जी के बेटों ने उसे गिरवाकर आधुनिक निर्माण करा लिया है। अब भी खंडहर रूप में पुरानी पतली वाली मजबूत ईंटें वहाँ दीख जाती हैं। हमारे बाबाजी ने रायपुर में जो कोठी बनवाई थी वह भी 1964 तक उसी तरह थी परंतु अब उसे भी छोटे ताऊ जी के पुत्र व पौत्रों ने गिरवाकर आधुनिक रूप दे दिया है। हमारे बाबूजी तो सरकारी नौकरी में और दूर-दूर रहे, इसलिए  हम लोग विशेषतः मैं तो जमींदाराना  बू से दूर रहे हैं। यही वजह है कि, दोनों ताऊजियों के पुत्र हमसे दूरी बनाए रहे हैं। 

राजेश्वर बली साहब जब रेलवे बोर्ड के सदस्य थे तब उन्होने हर एक्स्प्रेस गाड़ी का ठहराव दरियाबाद रेलवे स्टेशन पर करवा दिया था । अब भी वह परंपरा कुछ-कुछ लागू है। हमारे बाबाजी के छोटे भाई साहब हैदराबाद निज़ाम के दीवान रहे थे और उनके वंशज उधर ही बस गए हैं। 
समय के विपरीत धारा पर  : 
जहां एक ओर इस परिवार के अधिकांश लोग समयानुसार चल रहे हैं सिर्फ मैं ही समय के विपरीत धारा पर चलते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध चल रहा हूँ। हमारे पिताजी के सहपाठी और रूम मेट रहे कामरेड भीखा लाल जी से मिलने का मुझे सौभाग्य मिला है। भाकपा एम एल सी रहे  बाराबंकी के कामरेड रामचन्द्र बख्श सिंह साहब से भी हमारा सान्निध्य रहा वह हमारे बाबाजी के चचेरे भाई राय धर्म राजबली साहब के परिचितों में थे। इन राय धर्म राजबली साहब के बड़े पुत्र डॉ नरेंद्र राजबली साहब का निधन भी इस वर्ष जनवरी में हो गया है जबकि सबसे छोटे  योगेन्द्र राजबली साहब का निधन कुछ वर्ष पहले ही हो चुका है । इनके दूसरे पुत्र डॉ वीरेंद्र राजबली साहब न्यूयार्क में अपना व्यवसाय कर रहे हैं। हमारे लखनऊ आने के बाद जब  वीरेंद्र चाचा  यहाँ आये  हैं तब हमसे भी मिलने पिछ्ले दो वर्षों से हमारे घर आए हैं। इस वर्ष भी उनसे मुलाक़ात होगी, मैं उनको अपने ब्लाग पोस्ट्स ई मेल के जरिये भेजता रहता हूँ और वह पढ़ कर प्रिंट करा कर रिकार्ड में रख लेते हैं।बाबूजी के इन चचेरे भाइयों से हमें अनुराग मिलता रहा है।   
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24-10-2016

25-10-2016 

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बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

हम और हमारे पर्व ------ विजय राजबली माथुर

*जब पृथ्वी पर मानव सभ्यता का विकास हुआ तब मानव जीवन को सुखी,सम्पन्न,समृद्ध व दीर्घायुष्य बनाने के लिए प्रकृतिक नियमों के अनुसार चलने के सिद्धान्त खोजे और बताए गए थे। कालांतर में निहित स्वार्थी किन्तु चालाक मनुष्यों ने अपने निजी स्वार्थ के चलते उन नियमों को विकृत करके मानवता प्रतिगामी बना दिया और बड़ी ही धूर्तता से उसे धर्म के आवरण में ढक कर पेश किया जबकि वह कुतर्क पूरी तरह से अधार्मिक व थोथा पाखंड-ढोंग -आडंबर ही था। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि, खुद को एथीस्ट और प्रगतिशील कहलाने वाला तबका भी उसे ही धर्म की संज्ञा देकर अज्ञान-अंधकार को बढ़ाने में पोंगापंथियों की अप्रत्यक्ष सहाता ही करता है। 
अर्थशास्त्र के 'ग्रेशम ' सिद्धान्त के अनुसार खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है उसी प्रकार समाज में भी खराब बातें अच्छी बातों को बेदखल कर देती हैं। बदलते मौसम के अनुसार कुछ पर्व और उनके नियम मनुष्य के फायदे के लिए बनाए गए थे जिनको आज न कोई जानता है न ही जानना चाहता है। आज हर पर्व - त्योहार व्यापार/उद्योग जगत के मुनाफे का साधन बन कर रह गया है। अब ये पर्व स्वास्थ्य वर्द्धक जीवनोपयोगी नहीं रह गए हैं। 
पाँच वर्ष पूर्व से मेरी पत्नी ने मेरी बात मान कर 'करवा चौथ' , 'बरमावस ' जैसे हीन पर्वों का परित्याग कर दिया है। अतः हमारे घर से ढोंग-पाखंड विदा हो चुका है। हम अब सुविधानुसार मेटेरियल साईन्स : पदार्थ विज्ञान पर आधारित हवन ही करते हैं जो पर्यावरण शुद्धि का भी साधन है।

*जब तुलसीदास ने तत्कालीन शासन - व्यवस्था के विरुद्ध जनता का आह्वान करने हेतु 'रामचरितमानस ' को प्रारम्भ में 'संस्कृत ' में लिखना शुरू किया था तब काशी के ब्राह्मणों ने उनकी पांडु लिपियों को जला जला दिया जिस कारण उनको अयोध्या आकर 'अवधी ' में रचना करनी पड़ी। कालांतर में ब्राह्मणों ने दो चालें चलीं एक तो 'रामचरितमानस ' में 'ढ़ोल,गंवार,शूद्र,नारी ... ' जैसे प्रक्षेपक ठूंस कर तुलसीदास को और प्रकारांतर से राम को बदनाम कर दिया। दूसरी चाल काफी गंभीर थी जिसके जरिये एक जन - नायक राम को 'अवतार ' या 'भगवान ' घोषित करके उनका अनुसरण करने से रोक दिया गया।
वस्तुतः रावण प्रकांड विद्वान  और वास्तु शास्त्र विशेषज्ञ तो था किन्तु था विसतारवादी/साम्राज्यवादी उसने लगभग सम्पूर्ण विश्व की अपने अनुकूल घेराबंदी कर ली थी और भारत पर भी कब्जा करना चाहता था। उसे 'दशानन ' दसों दिशाओं ( पूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण,ईशान - उत्तर पूर्व,आग्नेय - दक्षिण पूर्व,नेऋत्य - दक्षिण पश्चिम,वावव्य - उत्तर पश्चिम,अन्तरिक्ष,भू गर्भ ) का ज्ञाता होने के कारण कहा जाता था । ...रावण ने सीता का अपहरण नहीं किया था राम व सीता की यह कूटनीति थी कि, सीता ने लंका पहुँच कर वहाँ की सामरिक व आर्थिक सूचनाओं को राम तक पहुंचाया था। सीता से सूचना पाकर ही राम की वायु सेना के प्रधान ' हनुमान ' ने 'राडार ' (सुरसा ) को नष्ट कर लंका में प्रवेश किया और कोशागार तथा आयुद्ध भंडारों को नष्ट करने के अलावा ' विभीषण ' को राम के साथ आने को राज़ी किया था।  भारत की जनता की ओर से राम ने कूटनीतिक व सामरिक युद्ध में रावण को परास्त कर भारत को साम्राज्यवाद की जकड़ से बचा लिया था। लेकिन दुर्भाग्य से आज वही राम साम्राज्यवादियों, व्यापारियों एवं ब्राह्मणों द्वारा जनता की लूट व शोषण हेतु तथा बाज़ार/कारपोरेट घरानों  की मजबूती के लिए प्रयोग किए जा रहे हैं।

*'ॐ नमः शिवाय च ' का अभिप्राय है भारत देश को नमन। इसे समझने के लिए भारत वर्ष का मानचित्र लेकर 'शिव ' के रूप मे की गई कल्पना को मिला कर विश्लेषण करना होगा। उत्तर में  हिम - आच्छादित हिमालय ही तो शिव के मस्तक का अर्द्ध चंद्र है। शिव के मस्तक में 'गंगा ' का प्रवेश इस बात का सूचक है कि, भारत भाल के ऊपर 'त्रिवृष्टि ' - तिब्बत स्थित 'मानसरोवर झील ' से गंगा का उद्गम है। शिव के साथ सर्प, बैल (नंदी ), मनुष्य आदि विविध जीवों का दिखाया जाना ' भारत की  विविधता में एकता ' का संदेश है। 'शिव ' का अर्थ ज्ञान - विज्ञान से है अर्थात शिव का आराधक व्यापक दृष्टिकोण वाला ही हो सकता है जो सम्पूर्ण देश के सभी प्राणियों के साथ सह - अस्तित्व की भावना रखता हो। इसका यह भी अर्थ है कि, जो देश के सभी प्राणियों से एक समान व्यवहार नहीं रखता है वह 'शिव - द्रोही ' अर्थात 'भारत देश का द्रोही ' है। तुलसीदास ने राम द्वारा यही कहलाया है 'जो सिव द्रोही सो मम द्रोही '। जो राम भक्त होने का दावा करे और राम के देश अर्थात शिव भारत के सभी लोगों में समान भाव न रखे वह न तो देश भक्त है न ही राम भक्त। 

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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

यादें तो यादें हैं कब क्यों याद पड़ जाएँ ------ विजय राजबली माथुर

इकतालीस वर्ष पूर्व जब तेईस वर्ष की अवस्था में नब्बे दिनों बेरोजगार रह कर निर्माणाधीन  होटल मुगल ओबराय के अकाउंट्स विभाग में 22 सितंबर 1975 को जाब ज्वाईन किया था तो तब यह खास तारीख थी। फरवरी 1985 में होटल मुगल शेरटन , आगरा का जाब छोडने तक का वर्णन इसी ब्लाग में समयानुसार किया जा चुका है। फिर एकदम अचानक से वहाँ ज्वाईन करने का ज़िक्र क्यों छेड़ा क्योंकि आज 22 सितंबर 2016 को एक और महत्वपूर्ण घटना का सामना करना पड़ा है। 

यों तो छोटों की गलतियों को नज़रअंदाज़ कर देना मेरी  आदत का हिस्सा है। लेकिन आज जब लगभग उतनी ही उम्र के एक छात्र फेसबुक फ्रेंड को अंनफ्रेंड करना और विभिन्न ग्रुप्स से हटाना पड़ा तब यह तारीख फिर से महत्वपूर्ण हो गई है। चार दिन पूर्व 18 सितंबर को छात्र नेता कन्हैया कुमार यहाँ लखनऊ सम्बोधन हेतु आए थे उनके सम्बोधन के अपने को खास लगे अंशों को अपने ब्लाग 'साम्यवाद COMMUNISM ' पर रात्रि 08 : 20 (20 : 20 ) pm पर प्रकाशित किया था। कानपुर के एक छात्र 'मयंक चकरोबरती ने उसे 10 :24 pm पर अपने नाम से कापी पेस्ट करके पब्लिश कर दिया। चूंकि यह छात्र हमारी पार्टी भाकपा का भी सदस्य है अतः कानपुर के ही एक बड़े प्रभावशाली कामरेड नेता के संज्ञान में सम्पूर्ण तथ्यों को डाला। ऊपरी दबाव में वह बड़े नेता भी इस छात्र के दुष्कृत्य को निंदनीय न ठहरा सके। वस्तुतः यू पी में भाकपा  अब एक ऐसे परिवार की पाकेट पार्टी है जिसमें पति,पत्नी,साली व दत्तक पुत्र की मर्ज़ी ही पार्टी नीति है और वैधानिक पदाधिकारी भी खुद को असहाय पाते हैं। अतः उनके प्रश्रय की प्रबल संभावना के मद्देनज़र उस छात्र को अपनी फेसबुक फ्रेंडशिप से हटाना पड़ा। यह पहला मौका है जब बेहद छोटे व्यक्ति पर बेमन से ही  कारवाई करनी पड़ी है। 



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शनिवार, 16 जुलाई 2016

सत्य कहने - मानने का साहस सब में नहीं होता ------ विजय राजबली माथुर



*चौधरी चरण सिंह जी जिस मेरठ कालेज,मेरठ के छात्र रहे उसी कालेज का 1969-71 मैं भी छात्र रहा हूँ। हमारे सोशियोलाजी के एक प्रोफेसर साहब जो चौधरी साहब की जाति से ही संबन्धित थे और चौधरी साहब के नाम से मशहूर थे तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह जी के कई कार्यों की सामाजिक समीक्षा किया करते थे , हालांकि यह कोर्स से हट कर होती थी। उनके अनुसार छपरौली में चौधरी चरण सिंह के कार्यकर्ता दलित बस्तियों को घेर कर उन लोगों को निकलने नहीं देते थे और उनके वोट चौधरी साहब को डाल लिए जाते थे। अखबारों की सुर्खियों में रहता था चौधरी साहब को दलितों का भरपूर समर्थन।
*इस वक्त भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल उस वक्त के SYS (समाजवादी युवजन सभा ) नेता और मेरठ कालेज छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष रहे सतपाल मलिक साहब जिनकी दौराला की शुगर फेक्टरियों से चौधरी चरण सिंह जी को भरपूर चन्दा मिलता था उनके छात्रसंघ 'एच्छिक' किए जाने के निर्णय से क्षुभ्ध होकर उनको चप्पलों की माला पहनाने की घोषणा कालेज कैंपस में कर गए थे।
*मुख्यमंत्री रहते ही चरण सिंह जी एक बार मेरठ के तत्कालीन जज जगमोहन लाल सिन्हा साहब के पास घर पर किसी केस के सिलसिले में पहुंचे थे। सिन्हा साहब ने अर्दली से पुछवाया था कि, पूछो चौधरी चरण सिंह मिलना चाहते हैं या मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह। चौधरी साहब ने जवाब भिजवाया था कि, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह जज साहब से मिलना चाहते हैं।  सिन्हा साहब ने बगैर मिले ही उनको लौटा दिया था यह कह कर कि, उनको मुख्यमंत्री से नहीं मिलना है। केस का निर्णय चौधरी साहब के चहेते के विरुद्ध आया था । सिन्हा साहब को एहसास था कि उसी की सिफ़ारिश मुख्यमंत्री करना चाहते थे जिस कारण वह उनसे नहीं मिले थे। 1975 में इन सिन्हा साहब ने ही इलाहाबाद हाई कोर्ट में इन्दिरा गांधी के निर्वाचन के विरुद्ध निर्णय दिया था।
*संविद सरकार ने चौधरी चरण सिंह के स्थान पर  राज्यसभा सदस्य त्रिभुवन नारायण सिंह जी (लाल बहादुर शास्त्री जी के मित्र और वैसे ही ईमानदार ) को मुख्यमंत्री बना लिया था। उनको छह माह के भीतर विधायक बनना था गोरखपुर के मनीराम क्षेत्र से उनको उप चुनाव लड़ना था। कांग्रेस ने अमर उजाला केअलीगढ़ स्थित पत्रकार  राम कृष्ण दिवेदी को खड़ा किया था चौधरी चरण सिंह जी ने गुपचुप उनको समर्थन दिला दिया और अपने मोर्चे के उम्मीदवार टी एन सिंह को हरवा दिया वह त्याग-पत्र देकर वापस राज्यसभा चले गए।
*1971 के लोकसभा के मध्यवधी चुनाव में चौधरी चरण सिंह शामली संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी थे उनके विरुद्ध भाकपा के ठाकुर विजय पाल सिंह खड़े थे। चौगटा मोर्चे का भी प्रत्याशी मैदान में था लेकिन उसके वोट कम्युनिस्ट विजयपाल सिंह जी को डलवाए गए और चौधरी चरण सिंह जी को हरवा दिया गया। तब जनसंघ के ए बी बाजपेयी साहब ने खुल्लमखुल्ला कहा था कि, हमने मनीराम की हार का बदला ले लिया।
*1977  में जब  बाबू जगजीवन राम को पी एम बनाने का सवाल आया था चौधरी चरण सिंह जी अड़ गए थे कि वह दलित प्रधानमंत्री नहीं कुबूल करेंगे जिस कारण फिर मोरारजी देसाई  पी एम बने थे और जब 1979 में उनके बाद फिर से बाबू जगजीवन राम जी का नाम आया तब चंद्रशेखर जी उनको न बनाने के लिए अड़ गए थे जिससे चौधरी चरण सिंह जी इन्दिरा जी के समर्थन से पी एम बन सके थे।



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54 वर्ष पूर्व 1962 में छोटी दिवाली के रोज़ हमारे 'रूक्स हायर सेकेन्डरी स्कूल,' बरेली कैंट जो अब 'रवीन्द्रनाथ टैगोर इंटर कालेज ' के नाम से जाना जाता है में हमारी कक्षा V I की छात्राओं से कक्षाध्यापक दीनानाथ जी द्वारा 'धर्मयुग' में प्रकाशित एक नाटक का मंचन करवाया  गया था जिसकी प्रारम्भिक पंक्तियाँ थीं ---" अमर सिंह तो मर गया, लक्ष्मी होकर करें मजूरी "।

भले ही यह एक व्यंग्य संगीत नाटिका हो किन्तु इसके द्वारा इस कटु  'सत्य ' को उजागर किया गया था कि, इस संसार में लोगों के नाम से भ्रम हो सकता है उसके अनुरूप वे होते नहीं हैं। प्रस्तुत फोटो द्वारा आरोप लगाने वाले प्रिंसपल साहब इसका ज्वलंत उदाहरण हैं जिनकी सत्य से मित्रता तो दूर-दूर तक नहीं ही है।जब कोई विख्यात हो जाता है तो समझने लगता है कि, वह जो भी झूठ परोस देगा उसे लोग उसकी ख्याति व उम्र के चलते सत्य ही मान लेंगे। इसी कारण आईने में अपना ही चेहरा देख कर दूसरे पर निराधार आरोप मढ़ दिया और जब इरादतन ऐसा किया गया हो तब खेद या पश्चाताप का प्रश्न ही कहाँ उठता है?

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1119108774817764&set=a.154096721318979.33270.100001559562380&type=3

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फेसबुक पर अक्सर कुछ लोग अपनी पोस्ट को लाईक करने व शेयर करने का अनुरोध करते दिखते हैं जबकि ऐसे लोग खुद दूसरों की पोस्ट शायद न ही शेयर करते हैं और न ही लाईक। लेकिन इसके विपरीत जब किसी विद्वान की अच्छी पोस्ट पर कुछ कमेन्ट करते हैं तब पोस्ट लेखक तो उसे लाईक करते हैं जबकि,मिश्रा,तिवारी,त्रिपाठी,पाण्डेय उपजाति के ब्राह्मण बेवजह कूद कर अनर्गल टिप्पणियाँ कर देते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि, एक अच्छे पोस्ट पर भी कोई कमेन्ट अहंकारी लोगों की अनर्गल टिप्पणियों से बचने हेतु न किया जाये। 
यदि किसी अच्छी पोस्ट को ब्लाग में स्थान दिया है तो अधिकांश प्रख्यात विद्वानों ने उसे पसंद किया है। किन्तु यदि किसी को महत्व दे दिया जाये और वह पूर्व ख्याति प्राप्त नहीं है न ही वह दूरदृष्टा निकले तो उसके दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच जाते हैं। तब ऐसी पोस्ट को हटाना ही श्रेयस्कर रहता है।
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

डाक्टर्स डे पर कुछ चिकित्सकों का ज़िक्र ------ विजय राजबली माथुर



यों तो समय समय पर अनेक चिकित्सक संपर्क में आते ही रहते हैं किन्तु जिनसे कुछ व्यक्तिगत आधार पर निजत्व रहा उनमें से ही जिनकी कुछ खास बातें याद हैं उनका ही उल्लेख हो सकेगा।
डॉ रामनाथ :
सबसे पहले डॉ रामनाथ का ज़िक्र करना चाहूँगा जो होटल मुगल,आगरा में हमारे  एक साथी के सहपाठी थे। उनसे मित्रवत ही मुलाक़ात हुई थी। माता जी के इलाज के लिए उनसे सलाह व दवा भी लेने लगे थे।  :उनके परामर्श  और सहयोग पर ही मैंने आयुर्वेद रत्न किया तथा वैद्य के रूप में RMP रेजिस्ट्रेशन भी करवाया। हालांकि वह तो इसी रेजिस्ट्रेशन पर एलोपैथी की ही ज़्यादा प्रेक्टिस करते थे। एलोपैथी व आयुर्वेदिक औषद्धियों दोनों का ही अध्यन कोर्स में किया भी था। किन्तु मेरी दिलचस्पी व जानकारी  होम्योपैथी औषद्धियों की अधिक थी/है। अतः मैंने प्रेक्टिस तो नहीं की किन्तु आयुर्वेदिक व होम्योपैथी उपचार परिचितों को बताता रहा।
सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज,आगरा के एक पूर्व चिकित्सक जिनका नर्सिंग होम हमारी कालोनी में ही था चाहते थे कि, मैं घर पर क्लीनिक खोल लूँ और क्रटिकल केस उनको रेफर करता रहूँ औरों की भांति मुझे कमीशन मिलता रहेगा। परंतु इस प्रकार धनार्जन मैं कर ही नहीं सकता था अतः उनके प्रस्ताव पर अमल नहीं किया।
इन्ही रामनाथ जी के पिताजी (कालीचरण वैद्य जी ) से एक बार माँ की दवा लेकर उनको पैसे दे आया था। अगले दिन फिर जाने पर पहले तो उन्होने वे पैसे लौटाए और फिर कहा कि तुम मेरे बेटे के मित्र हो तुमने हिम्मत कैसे की पैसे देने की और हिदायत दी कि आगे से दवा ले जाओ पैसे न दो। ज़्यादा पुरानी बात नहीं है सिर्फ 36 वर्ष पूर्व 1980 की बात है यह। लेकिन अब तो अपनी तीन-तीन जन्म पत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त करने वाले डॉ ज़रूरत पर सलाह मांगने पर चुप्पी साध लेते है। 36 वर्षों में चरित्र इतने बदल गए हैं।

डॉ डी मिश्रा :
इन डॉ रामनाथ जी के क्लीनिक के सामने ही डॉ डी मिश्रा साहब ने अपना होम्योपैथी का क्लीनिक खोला था और उनसे परिचय रामनाथ जी की मार्फत ही हुआ था। डॉ मिश्रा सिर्फ डॉ रामनाथ का मित्र होने के नाते मुझे जानते थे उनको मेरी होम्योपैथी में दिलचस्पी और आयुर्वेद रत्न होने की जानकारी नहीं थी। एक बार उनके कंपाउंडर जो डॉ रामनाथ के ही सहपाठी भी थे अपने पिता जी के निधन के कारण बंगलौर गए तब उनके स्थान पर  उनके आने तक डॉ मिश्रा ने मेरा सहयोग लिया था। इस दौरान उनकी कलाकारियों से परिचित होने के कई अवसर प्राप्त हुये। वैसे डॉ मिश्रा पाईलट आफ़ीसर थे और होटल क्लार्क शीराज, आगरा के पूर्व जेनरल मेनेजर के पुत्र थे। लंदन की उड़ानों के दौरान वहाँ की किसी होम्योपैथिक संस्था से रेजिस्ट्रेशन करवाकर वह होम्योपैथ चिकित्सक बन गए थे। अपने पिताजी के लकवाग्रस्त होने पर इंडियन एयर लाईन्स की सेवा जल्दी ही छोड़ दी थी । प्रारम्भ में वह सुबह हाथरस में और शाम को आगरा में प्रेक्टिस करते थे। फिर हाथरस जाना बंद कर दिया था। 
एक दिन किसी बच्चे के पेट में तीव्र दर्द होने के कारण उन्होने रेक्टीफ़ाईड स्प्रिट में मिला कर एलोपैथी की पिप्टाल के ड्राप्स देकर शीघ्र राहत प्रदान की थी। बाद में मेरे पूछने पर बोले बिजनेस में थोड़ा-बहुत इम मोरेल होना पड़ता है। अर्थात चिकित्सक का पेशा वह बतौर बिजनेस कर रहे थे। 
एक दिन मेहरा आफ़सेट प्रेस के श्याम मेहरा साहब जो उनके क्लब के साथी थे अपनी श्रीमती जी  के साथ उन की दवा लेने आए हुये थे अपनी कुछ समस्या भी बताने लगे। डॉ मिश्रा ने मुझसे कहा माथुर साहब श्याम बाबू को BG की एक डोज़ दे दो। मैंने सादी  गोलियों की पुड़िया दे दी। थोड़ी देर में उन्होने श्याम बाबू से पूछा कुछ राहत है? वह बोले हाँ थोड़ा ठीक है, डॉ मिश्रा ने उनको थोड़ी देर और रुकने को कहा उसके बाद ही कार ड्राइव करना ठीक रहेगा। जब वह चले गए तब मैंने डॉ मिश्रा से पूछा कि, BG(ब्लैंक  ग्लोबल्स ) अर्थात सादी  गोलियों से मेहरा साहब को फायदा कैसे हो गया? तब डॉ मिश्रा का जवाब था कि, उनको हुआ ही क्या था? वह तो अपनी मिसेज को यह जतलाना चाहते थे कि, वह भी बीमार हैं जिससे वह अपनी बीमारी का गम भूल जाएँ। तो यह था डॉ मिश्रा का साइक्लोजिकल ट्रीटमेंट। 
डॉ खेमचंद खत्री :
डॉ के सी खत्री, होम्योपैथ से व्यक्तिगत परिचय उन साथी की मार्फत ही हुआ था जिनके मार्फत डॉ रामनाथ से परिचय हुआ था। वैसे डॉ खत्री को मैं इसलिए जानता था कि, वह पहले डॉ पारीक के स्टोर्स में कार्यरत थे और मैं वहाँ से होम्योपैथी दवाएं खरीदता था। फिर डॉ खत्री के स्टोर्स से लेने लगा। हालांकि डॉ खत्री खुद दयालबाग के राधास्वामी सत्संग के सेक्रेटरी थे और उनको मेरे कम्युनिस्ट पार्टी से सम्बद्ध होने की जानकारी थी किन्तु व्यक्तिगत स्तर पर मधुर संबंध रहे। जब उनके दामाद साहब का स्टोर दयालबाग में खुल गया तब नजदीक होने के कारण उनसे दवाएं खरीदने लगे। वहाँ डॉ खत्री आते रहते थे और उनसे मुलाक़ात होती रहती थी। उनके दामाद डॉ डी डी पाराशर तो मुझे गुरु जी कहते थे और काफी सम्मान देते थे। आगरा छोडने तक इन दोनों से संपर्क बना रहा था।   

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शनिवार, 25 जून 2016

बउआ को 22 वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजली -------- विजय राजबली माथुर

(स्व.कृष्णा माथुर : जन्म- 20 अप्रैल 1924 मृत्यु - 25 जून 1995 )

जिस समय रात्रि पौने आठ बजे बउआ (माँ ) ने अंतिम सांस ली मैं और यशवंत ही पारिवारिक सदस्य वहाँ थे। इत्तिफ़ाक से कंपाउंडर महोदय ग्लूकोज चढ़ाने आए हुये थे। 16 जून 1994 को शालिनी व 13 जून 1995 को बाबूजी के निधन के बाद आगरा में मैं और यशवंत ही थे। अजय अपने परिवार के साथ फरीदाबाद में कार्यरत होने के कारण थे। दो दिन पूर्व 23 जून को ही आगरा से गए थे ड्यूटी ज्वाइन करने। शालिनी के निधन के बाद शोभा (बहन ) ने यशवंत को माँ से अपने साथ ले जाने को मांगा था, किन्तु अजय की श्रीमती जी ने ऐसा न करने की उनको सलाह दी थी। यदि माँ ने मेरी सलाह  के बगैर अपनी बेटी को अपना  पौत्र सौंप दिया होता तो उस समय मैं ही अकेला वहाँ होता। 

यशवंत की निष्क्रिय फेसबुक आई डी पर यह सूचना थी जिसे उसने 18 जून 2016 को अचानक देखा ---
एकदम से धक्का लगा छोटे बहनोई साहब के अचानक निधन समाचार से। जब इस बाबत बहन से ज़िक्र किया तो यह उत्तर मिला जिससे और भी धक्का लगा ---

भले ही हमें साढ़े तीन माह बाद ही पता चला लेकिन जब चल गया तो छोटी बहन को इस समय कोई भी उत्तर देना नैतिकता के विरुद्ध होगा और फिर वह महिला होने के नाते भी तमाम सहानुभूतियाँ बटोर ही लेंगी।दिल तो कोई भी चीर कर नहीं दिखा सकता लेकिन दिल पर हाथ रख कर ईमानदारी से सोचने पर सच का एहसास तो हो ही जाता है।  फिर भी इतना तो कहना ही होगा कि, मेरे घर के पते के विजिटिंग कार्ड शोभा, कमलेश बाबू और उनके बड़े बेटी-दामाद को मैंने खुद अपने हाथ से दिये थे जब वे लोग 2011 में लखनऊ कमलेश बाबू की  भतीजी की शादी में आए थे। वहाँ जाकर खुद मैंने कमलेश बाबू व उनके बड़े दामाद को घर पर आने का आग्रह किया था । शोभा - कमलेश बाबू तो दो दिन हमारे घर पर रुके भी थे जबकि उनके बेटी - दामाद व धेवती मिल कर चले गए थे ।कमलेश बाबू के भाई दिनेश हमारे घर दो बार आ चुके थे और फोन पर उनकी पत्नी ने  बताया था कि  शादी का कार्ड डाक से भेज चुके हैं। पता उनके पास भी था । उनके जरिये भी सूचित किया जा सकता था। यहाँ के प्रवास और फिर लौटने के बाद उन लोगों के किस कदम के कारण तब से टेलीफोनिक संपर्क टूटा यह तो अपने दिल पर हाथ रख कर सोचने की बात थी। ई -मेल एड्रेस भी कमलेश बाबू तथा उनके दोनों दामादों व छोटी बेटी के पास थे। खैर बड़े होने के नाते इल्जाम तो  हमें ही सहने ही होंगे। 

माँ और कमलेश बाबू दोनों के जन्मदिन एक ही थे 20 अप्रैल। इस बार किसी की पुण्यतिथि पर हवन नहीं कर सका हूँ। मौका मिलते ही कमलेश बाबू की आत्मा की शांति हेतु भी कर लेंगे। 

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